Prostate Cancer: भारत में पुरुषों के स्वास्थ्य को लेकर एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है, जहाँ प्रोस्टेट कैंसर देश का दूसरा सबसे आम कैंसर बनता जा रहा है। चिकित्सा विशेषज्ञों और डॉक्टरों का मानना है कि इस बीमारी से निपटने में सबसे बड़ी चुनौती केवल इसके बढ़ते मामलों का होना ही नहीं है, बल्कि समय पर इसकी पहचान न हो पाना है। पश्चिमी देशों में नियमित और व्यवस्थित स्क्रीनिंग की सुविधा के कारण प्रोस्टेट कैंसर का पता शुरुआती चरण में ही चल जाता है, लेकिन इसके विपरीत भारत में अधिकांश मरीज तब डॉक्टरों के पास पहुंचते हैं जब कैंसर प्रोस्टेट ग्रंथि से बाहर शरीर के अन्य अंगों में फैल चुका होता है। ऐसे गंभीर मामलों में कैंसर हड्डियों और रीढ़ की हड्डी तक पहुंच जाता है, जिससे मरीजों के लिए जानलेवा न्यूरोलॉजिकल समस्याएं पैदा होने का खतरा काफी हद तक बढ़ जाता है।

जागरूकता में वृद्धि लेकिन इलाज में हो रही है भारी देरी
सर गंगा राम अस्पताल के जाने-माने यूरो-ऑन्कोलॉजिस्ट और वरिष्ठ रोबोटिक सर्जन डॉ. अश्विन मलाया ने इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि पहले के समय में प्रोस्टेट कैंसर के अधिकांश मरीज केवल बड़े महानगरों से ही इलाज के लिए आते थे, लेकिन अब छोटे और दूरदराज के शहरों से भी बड़ी संख्या में मरीज अस्पताल पहुंच रहे हैं। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि समाज में अब इस बीमारी को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। इसके बावजूद, यह बेहद विडंबनापूर्ण है कि कई पुरुष अब भी बीमारी के बेहद गंभीर अवस्था में पहुंच जाने के बाद ही अस्पताल का रुख करते हैं, जिससे उनके इलाज की संभावनाएं काफी सीमित हो जाती हैं।

जब शरीर के अन्य हिस्सों में फैल जाता है खतरनाक कैंसर
डॉ. अश्विन मलाया के अनुसार, जब प्रोस्टेट कैंसर अनियंत्रित होकर शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलने लगता है, तो यह अक्सर रीढ़ की हड्डी को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। इसके शुरुआती और गंभीर लक्षणों में लगातार पीठ या कमर दर्द रहना, पैरों में अचानक कमजोरी महसूस होना, चलने-फिरने में भारी परेशानी होना, अंगों में सुन्नपन या झुनझुनी आना तथा पेशाब या मल त्याग पर से नियंत्रण पूरी तरह खत्म हो जाना शामिल है। ये सभी लक्षण रीढ़ की हड्डी पर पड़ने वाले दबाव यानी ‘स्पाइनल कॉर्ड कम्प्रेशन’ की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं, जिसे किसी भी स्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह एक आपातकालीन चिकित्सीय स्थिति (Medical Emergency) है।
किन प्रमुख लक्षणों और संकेतों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज
चिकित्सकों की सलाह है कि पेशाब से जुड़ी किसी भी प्रकार की लगातार बनी रहने वाली समस्या, हड्डियों में होने वाले असहनीय दर्द या लंबे समय से चले आ रहे कमर के दर्द को कभी भी मामूली समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसके अलावा, यदि किसी व्यक्ति के परिवार में पहले से ही प्रोस्टेट कैंसर का मेडिकल इतिहास रहा हो, तो उन्हें कम उम्र में ही अपनी नियमित जांच शुरू करवा देनी चाहिए। डॉक्टरों का मानना है कि समय पर की गई जांच और सतर्कता ही प्रोस्टेट कैंसर के कारण होने वाले न्यूरोलॉजिकल नुकसान और गंभीर खतरों से बचने का एकमात्र सबसे प्रभावी और अचूक तरीका है।
शुरुआती पहचान के लिए बेहद जरूरी हैं ये मेडिकल टेस्ट्स
डॉ. अश्विन मलाया का कहना है कि यदि प्रोस्टेट कैंसर का पता इसके शुरुआती चरण में ही चल जाए, तो इसका उपचार बेहद प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। शुरुआती जांच प्रक्रिया में ‘प्रोस्टेट-स्पेसिफिक एंटीजन’ (PSA) ब्लड टेस्ट सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि पीएसए का स्तर सामान्य से अधिक या असामान्य पाया जाए, तो डॉक्टर मल्टी-पैरामेट्रिक एमआरआई और एमआरआई-ट्रस फ्यूजन बायोप्सी जैसी आधुनिक जांचों की मदद लेते हैं, जिससे बीमारी की सटीक स्थिति का पता चलता है। हालांकि, डॉ. मलाया ने अफसोस जताते हुए कहा कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद आज भी लगभग 50 प्रतिशत प्रोस्टेट कैंसर के मरीज सीधे चौथी यानी स्टेज 4 में अस्पताल पहुंचते हैं, जहां बीमारी को नियंत्रित तो किया जा सकता है लेकिन उसे पूरी तरह ठीक करना लगभग असंभव हो जाता है।
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