Russia Oil Tariff: अमेरिकी सीनेट ने शुक्रवार को ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ को मंजूरी दे दी। यह दोनों प्रमुख अमेरिकी राजनीतिक दलों के समर्थन वाला व्यापक प्रतिबंध पैकेज है। इसका मुख्य उद्देश्य रूस और ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना तथा उनकी वित्तीय क्षमताओं को कमजोर करना है। इसके साथ ही प्रस्तावित कानून उन देशों को भी निशाने पर लेता है, जो रूस से ऊर्जा खरीदकर कथित तौर पर उसकी अर्थव्यवस्था और युद्ध प्रयासों को आर्थिक समर्थन देते हैं।

दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर बिल
इस कानून का नाम दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ओ. ग्राहम के सम्मान में रखा गया है। वह इस प्रतिबंध कानून को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल थे। प्रस्तावित कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों के खिलाफ टैरिफ और अन्य प्रतिबंध लगाने का अधिकार दिया जाएगा, जो बड़ी मात्रा में रूसी तेल और प्राकृतिक गैस की खरीद जारी रखते हैं। इसका मकसद रूस की ऊर्जा आय को प्रभावित करना और मॉस्को पर युद्ध समाप्त करने के लिए दबाव बढ़ाना है।

अब प्रतिनिधि सभा में जाएगा प्रस्ताव
सीनेट से मंजूरी मिलने के बाद यह बिल अब अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में जाएगा। वहां से पारित होने के बाद इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर के लिए व्हाइट हाउस भेजा जाएगा। हालांकि, मौजूदा प्रस्ताव पहले पेश किए गए कुछ कड़े प्रस्तावों की तुलना में अपेक्षाकृत नरम है। पुराने प्रस्तावों में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों से होने वाले आयात पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की बात कही गई थी।
अधिकतम टैरिफ अब 100 प्रतिशत होगा
नए प्रस्ताव में अधिकतम टैरिफ की सीमा घटाकर 100 प्रतिशत कर दी गई है। हालांकि यह दर भी काफी ऊंची है और यदि लागू होती है तो रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों के साथ अमेरिका के व्यापारिक संबंधों पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य सीधे तौर पर रूस पर आर्थिक दबाव डालने के साथ-साथ उसके ऊर्जा कारोबार से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को भी प्रभावित करना है।
राष्ट्रपति के पास कार्रवाई में बदलाव का अधिकार
इस बिल में अमेरिकी राष्ट्रपति को काफी व्यापक अधिकार दिए गए हैं। यदि राष्ट्रपति यह मानते हैं कि किसी मामले में अमेरिकी राष्ट्रीय हित प्रभावित हो सकता है, तो वे प्रस्तावित पेनल्टी को माफ कर सकते हैं, उनके कार्यान्वयन में देरी कर सकते हैं या उनमें बदलाव कर सकते हैं। इसका मतलब है कि कानून बनने के बावजूद हर संबंधित देश पर प्रतिबंध या टैरिफ स्वतः लागू नहीं होंगे।

भारत पर भी बनी रहेगी अमेरिकी नजर
रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत रूसी कच्चे तेल के प्रमुख खरीदारों में शामिल रहा है। भारत ने पश्चिमी देशों की पाबंदियों के बावजूद रूस से बड़ी मात्रा में रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदा है। इससे भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों को अपेक्षाकृत कम कीमत पर पूरा करने में मदद मिली है, जबकि रूस को तेल निर्यात से होने वाली आय बनाए रखने में सहायता मिली है। इसी कारण प्रस्तावित अमेरिकी कानून के संदर्भ में भारत भी महत्वपूर्ण देशों में शामिल हो गया है।
भारत पर तुरंत नहीं लगेगा टैरिफ
हालांकि बिल में भारत का नाम संभावित रूप से प्रभावित देशों के संदर्भ में चर्चा में है, लेकिन कानून बनने की स्थिति में भी भारत पर टैरिफ अपने आप लागू नहीं होगा। प्रस्तावित कानून अमेरिकी प्रशासन को यह तय करने की पर्याप्त छूट देता है कि किसी देश के खिलाफ कार्रवाई करनी है या नहीं। इसलिए भारत पर संभावित अमेरिकी कदम राष्ट्रपति और प्रशासन के फैसले पर निर्भर करेगा।
भारत-अमेरिका रणनीतिक रिश्तों की होगी परीक्षा
विशेषज्ञों का मानना है कि वॉशिंगटन भारत के खिलाफ कोई फैसला लेते समय दोनों देशों की व्यापक रणनीतिक साझेदारी को ध्यान में रखेगा। इसमें इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग, रक्षा साझेदारी, तकनीकी सहयोग और चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने जैसी प्राथमिकताएं शामिल हैं। इसलिए भारत पर किसी भी संभावित टैरिफ को केवल रूस से तेल खरीदने के मुद्दे तक सीमित करके देखना उचित नहीं होगा।
भारतीय निर्यात पर पड़ सकता है असर
यदि भविष्य में अमेरिका भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लागू करता है, तो इसका असर दोनों देशों के व्यापार पर पड़ सकता है। भारत से अमेरिका को होने वाले अरबों डॉलर के निर्यात में इंजीनियरिंग उत्पाद, दवाएं, रसायन, टेक्सटाइल और ऑटो पार्ट्स जैसे कई प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं। ऐसे में नए अमेरिकी प्रतिबंध दोनों देशों के कारोबारी रिश्तों के लिए चुनौती बन सकते हैं और नई दिल्ली-वॉशिंगटन संबंधों में तनाव बढ़ने की आशंका भी पैदा कर सकते हैं।
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