छत्तीसगढ़ में जूनियर डॉक्टरों के OPD बहिष्कार के चलते गुरुवार को सरकारी अस्पतालों में मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ा। राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों और उनसे संबद्ध अस्पतालों में जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल का असर ओपीडी सेवाओं पर देखने को मिला। बड़ी संख्या में मरीज इलाज और परामर्श के लिए अस्पताल पहुंचे, लेकिन नियमित व्यवस्था प्रभावित होने से उन्हें इंतजार और वैकल्पिक सेवाओं पर निर्भर रहना पड़ा।
मांगें पूरी नहीं होने से जूनियर डॉक्टरों में नाराजगी
जूनियर डॉक्टरों का कहना है कि वे लंबे समय से अपनी मांगों को सरकार और संबंधित विभाग के सामने रखते आ रहे हैं, लेकिन अभी तक उन पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई है। डॉक्टरों के मुताबिक, इसी वजह से उनके बीच नाराजगी बढ़ी है और उन्हें विरोध का रास्ता अपनाना पड़ा। वहीं अस्पताल प्रबंधन की ओर से मरीजों को राहत देने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था किए जाने की बात कही गई है।
डेढ़ साल से मांगों को लेकर सरकार से बातचीत का दावा
प्रदर्शन कर रहे जूनियर डॉक्टरों का दावा है कि वे करीब डेढ़ साल से अपनी मांगों को सरकार के सामने रखते आ रहे हैं। उनका कहना है कि कई बार मांगों को लेकर चर्चा और ज्ञापन दिए गए, लेकिन समाधान नहीं निकल पाया। डॉक्टरों के अनुसार, मौजूदा विरोध का उद्देश्य सरकार का ध्यान लंबित मांगों की ओर आकर्षित करना है।
इंटर्न डॉक्टरों के स्टाइपेंड में बढ़ोतरी की मांग
जूनियर डॉक्टरों की प्रमुख मांगों में इंटर्न डॉक्टरों के स्टाइपेंड में बढ़ोतरी शामिल है। प्रदर्शनकारी डॉक्टरों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में वर्तमान में इंटर्न डॉक्टरों को 15,900 रुपये का स्टाइपेंड मिल रहा है। उनका कहना है कि कई अन्य राज्यों में इंटर्न डॉक्टरों के स्टाइपेंड की राशि 30 हजार रुपये तक पहुंच चुकी है। इसी आधार पर वे छत्तीसगढ़ में भी स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग कर रहे हैं।
डॉक्टर बोले- सरकार ने आंदोलन के लिए मजबूर किया
प्रदर्शन कर रहे डॉक्टरों का आरोप है कि उनकी मांगों पर लंबे समय से सुनवाई नहीं होने के कारण मौजूदा स्थिति बनी है। उनका कहना है कि वे मरीजों की परेशानी को समझते हैं और इसी वजह से फिलहाल विरोध के दौरान भी सेवाओं को पूरी तरह बंद नहीं किया गया है। डॉक्टरों ने अपनी मांगों को जायज बताते हुए सरकार से जल्द समाधान निकालने की अपील की है।
28 सितंबर तक मांगें पूरी करने का अल्टीमेटम
जूनियर डॉक्टरों ने सरकार को 28 सितंबर 2026 तक का समय दिया है। उनका कहना है कि यदि निर्धारित तारीख तक उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती है, तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। डॉक्टरों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने की चेतावनी भी दी है। इससे राज्य के सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं पर और अधिक असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
इमरजेंसी सेवाएं बंद करने की चेतावनी
जूनियर डॉक्टर अनिरुद्ध चंद्राकर ने कहा कि डॉक्टरों ने हड़ताल के दौरान भी मरीजों को ध्यान में रखते हुए ओपीडी सेवा जारी रखने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि यदि 28 सितंबर तक मांगों का समाधान नहीं हुआ तो इमरजेंसी सेवाएं भी बंद करने का निर्णय लिया जा सकता है। उनके मुताबिक, ऐसा कदम मरीजों के लिए परेशानी पैदा करेगा, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में उनके पास आंदोलन आगे बढ़ाने के अलावा विकल्प नहीं बचा है।
अनिश्चितकालीन हड़ताल से बढ़ सकती है स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौती
यदि जूनियर डॉक्टर 28 सितंबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाते हैं और इमरजेंसी सेवाएं भी प्रभावित होती हैं, तो सरकारी मेडिकल कॉलेजों और संबद्ध अस्पतालों में मरीजों के इलाज की व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। फिलहाल अस्पतालों में वैकल्पिक व्यवस्था के जरिए सेवाएं जारी रखने की कोशिश की जा रही है। अब सभी की नजर सरकार और जूनियर डॉक्टरों के बीच होने वाली अगली बातचीत तथा 28 सितंबर की समयसीमा पर है।
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