Bihar voter list controversy: बिहार की मतदाता सूची को लेकर चुनाव आयोग पर एक नया विवाद उठ खड़ा हुआ है। 1 अगस्त को बिहार की मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित हुई थी, लेकिन इसमें लगभग 2 लाख मतदाताओं ने खुद अपना नाम हटाने के लिए आवेदन किया है। यह स्थिति चुनाव आयोग के लिए चिंता का विषय बनी हुई है और साथ ही राजनीतिक दलों के बीच भी मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रही है।

मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण और आवेदन की संख्या
चुनाव आयोग ने मसौदा सूची को लेकर 1 सितंबर तक आपत्तियां दर्ज कराने का समय सीमा दी थी। 30 अगस्त तक मिली शिकायतों के अनुसार, लगभग 1.98 लाख मतदाताओं ने अपनी इच्छा से नाम हटाने के लिए आवेदन किया है। वहीं, केवल 29,000 से अधिक मतदाताओं ने सूची में नाम जोड़ने की मांग की है। चुनाव आयोग ने इन आंकड़ों की पुष्टि की है और साथ ही लगभग 3 लाख अन्य मतदाताओं को नोटिस भेजे हैं।

SIR प्रक्रिया और बहिष्कृत मतदाता विवाद
बिहार में SIR (Special Summary Revision) प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से लगभग 65 लाख नाम हटाए गए थे। इस कदम का उद्देश्य अवैध मतदाताओं को सूची से बाहर करना था। हालांकि, विपक्षी दलों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी, क्योंकि उनका आरोप था कि हटाए गए नामों में कई वैध मतदाता भी शामिल हैं। इस विवाद के बीच, चुनाव आयोग ने शुरू में हटाए गए मतदाताओं की सूची प्रकाशित नहीं की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सूची सार्वजनिक की गई।
फिर भी, राजनीतिक दलों ने उन बहिष्कृत मतदाताओं के लिए शिकायत दर्ज कराने में सीमित सक्रियता दिखाई है। अब तक केवल 29,000 आवेदन ही सूची में नाम जोड़ने के लिए आए हैं, जबकि यह संख्या हटाए गए मतदाताओं की तुलना में बहुत कम है।
चुनाव आयोग के सामने उठ रहे सवाल
यह स्थिति दो अहम सवाल खड़े करती है। पहला, यदि 65 लाख मतदाताओं को SIR के बाद बहिष्कृत किया गया है, तो क्या सभी हटाए गए नाम अवैध थे या वैध मतदाता भी इसमें शामिल थे? दूसरा, यदि कुछ मतदाता स्वयं अपने नाम हटाने के लिए आवेदन कर रहे हैं, तो वे अपने नाम सूची में कैसे शामिल हो गए थे?
चुनाव आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य अवैध मतदाताओं को बाहर करना है और जो लोग स्वयं नाम हटाने की मांग कर रहे हैं, वे संभवत: गलती या दुविधा के कारण ऐसा कर रहे हैं। लेकिन इससे मतदाता सूची की पारदर्शिता और सटीकता पर भी सवाल उठते हैं।
राजनीतिक दलों की भूमिका
राजनीतिक दलों ने मतदाता सूची के विवाद पर जो प्रतिक्रिया दी है, वह भी चर्चा का विषय है। बहिष्कृत मतदाताओं की वैधता साबित करने या उनकी वापसी के लिए दल अपेक्षित स्तर की सक्रियता नहीं दिखा रहे हैं। इससे यह प्रतीत होता है कि राजनीतिक हित इस मामले में प्राथमिकता हैं, न कि वास्तविक मतदाता सुरक्षा।
बिहार की मतदाता सूची विवाद इस बात की ओर संकेत करता है कि देश में मतदाता सूची के पुनरीक्षण और प्रबंधन में अभी भी कई कमजोरियां मौजूद हैं। चुनाव आयोग को चाहिए कि वह इस प्रक्रिया को और पारदर्शी, विश्वसनीय और निष्पक्ष बनाए। साथ ही राजनीतिक दलों को भी मतदाता अधिकारों के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। तभी लोकतंत्र की इस बुनियादी प्रक्रिया पर जनता का विश्वास कायम रह सकेगा।
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