Chhattisgarh Foundation Day 2026 : छत्तीसगढ़ आज 1 नवंबर को अपना 26वां स्थापना दिवस मना रहा है। वर्ष 2000 में इसी तारीख को मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ देश के 26वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया था। लेकिन इस प्रदेश की पहचान केवल 26 वर्षों के प्रशासनिक इतिहास तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ें प्राचीन दक्षिण कोसल, ऐतिहासिक राजवंशों, जनजातीय आंदोलनों, सामाजिक सुधारों और स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों से जुड़ी हैं। छत्तीसगढ़ की धरती ने सदियों से अपनी अलग सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान बनाए रखी है।

दक्षिण कोसल से शुरू हुआ छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास
इतिहासकार डॉ. रमेंद्र नाथ मिश्र ने ईटीवी भारत से बातचीत में बताया कि छत्तीसगढ़ का इतिहास बेहद प्राचीन और गौरवशाली रहा है। इस क्षेत्र को पुराने समय में दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था। यहां मौर्य शासन के प्रभाव के साथ पांडुवंशी और सोमवंशी राजाओं का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। इन राजवंशों के शासनकाल में क्षेत्र की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं का विकास हुआ। डॉ. मिश्र के मुताबिक, छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक पहचान को समझने के लिए प्राचीन राजवंशों के साथ यहां के पुरातात्विक स्थलों और सांस्कृतिक विरासत का अध्ययन भी जरूरी है।

कलचुरी शासन और 36 गढ़ों से जुड़ा नामकरण
मध्यकाल में छत्तीसगढ़ के इतिहास में कलचुरी राजवंश का विशेष स्थान रहा। डॉ. मिश्र के अनुसार, लगभग 875 से 1741 तक अलग-अलग चरणों में कलचुरी शासकों का प्रभाव इस क्षेत्र में बना रहा। रतनपुर और रायपुर कलचुरी शासन की प्रमुख शाखाओं के रूप में प्रसिद्ध थीं। मान्यता के अनुसार, दोनों शाखाओं के अंतर्गत 18-18 गढ़ थे। इस तरह कुल 36 गढ़ों की परंपरा को छत्तीसगढ़ नाम की उत्पत्ति से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि इस नामकरण को लेकर ऐतिहासिक व्याख्याएं भी प्रचलित हैं।
1487 में साहित्य में छत्तीसगढ़ शब्द का उल्लेख
छत्तीसगढ़ नाम के इतिहास पर चर्चा करते हुए डॉ. मिश्र बताते हैं कि खैरागढ़ के राजा लक्ष्मीनिधि राय के चारण कवि दलराम राव द्वारा वर्ष 1487 में इस शब्द का प्रयोग किए जाने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद ऐतिहासिक दस्तावेजों में भी इस नाम का इस्तेमाल दिखाई देता है। ब्रिटिश अधिकारी मेजर एग्न्यू ने 23 दिसंबर 1820 को तैयार अपनी रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ प्रोविन्स शब्द का उल्लेख किया था। वहीं, भोसले शासन के वर्ष 1837 के कुछ दस्तावेजों में छत्तीसगढ़ जिला नाम मिलता है। 1854 से 1861 के बीच ब्रिटिश प्रशासन में भी इस क्षेत्र को छत्तीसगढ़ प्रांत कहा गया।
मराठा शासन से ब्रिटिश हुकूमत तक बदली राजनीतिक परिस्थितियां
कलचुरी शासन के बाद वर्ष 1741 से इस क्षेत्र में मराठा प्रभाव बढ़ा, जो 1853 तक अलग-अलग रूपों में बना रहा। इसके बाद ब्रिटिश शासन का विस्तार हुआ। डॉ. मिश्र के अनुसार, वर्ष 1853 से 1947 तक छत्तीसगढ़ औपनिवेशिक शासन के अधीन रहा। रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग जैसे इलाके सीधे ब्रिटिश प्रशासन के नियंत्रण में थे, जबकि अन्य क्षेत्रों में रियासतों का शासन चलता था। उस समय प्रदेश में 14 रियासतें होने का उल्लेख मिलता है। इस दौर में प्रशासनिक बदलावों के साथ सामाजिक और राजनीतिक चेतना का भी विस्तार हुआ।

गुरु घासीदास और वीर नारायण सिंह ने जगाई सामाजिक चेतना
छत्तीसगढ़ के सामाजिक इतिहास में गुरु घासीदास का योगदान बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने सामाजिक जागरण और समानता का संदेश दिया। दूसरी ओर, सोनाखान के जमींदार वीर नारायण सिंह ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष कर अपनी अलग पहचान बनाई। इतिहासकार के मुताबिक, 10 दिसंबर 1857 को रायपुर में वीर नारायण सिंह को फांसी दी गई थी। उन्हें छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद के रूप में याद किया जाता है। उनका बलिदान प्रदेश के स्वतंत्रता संघर्ष का महत्वपूर्ण अध्याय है।
जल, जंगल और जमीन के लिए आदिवासी विद्रोहों का इतिहास
छत्तीसगढ़ के इतिहास में जनजातीय समुदायों के संघर्षों का विशेष स्थान है। बस्तर सहित विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासी समाज ने मराठा शासकों, अंग्रेजों और स्थानीय सत्ता के विरुद्ध कई विद्रोह किए। इन आंदोलनों के पीछे जमीन, जंगल, परंपराओं और अधिकारों की रक्षा की भावना प्रमुख थी। प्रमुख जनजातीय विद्रोहों में हल्बा विद्रोह (1774-1777), परलकोट विद्रोह (1824-1825), तारापुर विद्रोह (1842-1854), मेरिया विद्रोह (1842-1863), लिंगागिरी विद्रोह (1856-1857), कोई विद्रोह (1859) और भूमकाल विद्रोह (1910) शामिल हैं।
भूमकाल विद्रोह और गुंडाधुर का ऐतिहासिक योगदान
बस्तर का भूमकाल विद्रोह वर्ष 1910 में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध हुए प्रमुख जनजातीय आंदोलनों में गिना जाता है। इस संघर्ष में गुंडाधुर जैसे जनजातीय नायकों का योगदान विशेष रूप से याद किया जाता है। डॉ. मिश्र के अनुसार, इन विद्रोहों को केवल स्थानीय विरोध नहीं समझना चाहिए, बल्कि इन्हें आदिवासी समाज की अस्मिता और अधिकारों की रक्षा के व्यापक संघर्ष के रूप में देखना चाहिए। उन्होंने बस्तर के जनजातीय इतिहास को समझने के लिए डॉ. हीरालाल शुक्ल की पुस्तक का भी उल्लेख किया।
अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग के पीछे 36 वर्षों का संघर्ष
छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाने की मांग अचानक नहीं उठी थी। इसके पीछे लंबे समय तक सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन चले। डॉ. रमेंद्र नाथ मिश्र बताते हैं कि वे स्वयं 36 वर्षों तक राज्य स्थापना आंदोलन से जुड़े रहे। इस दौरान बिलासपुर, दुर्ग और अन्य स्थानों पर आयोजित आंदोलनों में उन्होंने भाग लिया। मध्य प्रदेश विधानसभा में अलग राज्य के गठन से संबंधित प्रस्ताव पारित होने के समय भी वे मौजूद थे। लंबे संघर्ष और राजनीतिक प्रक्रिया के बाद 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ अलग राज्य बन गया।
एक और दो नवंबर की तारीखों का ऐतिहासिक महत्व
छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक इतिहास में 1 और 2 नवंबर की तारीखें विशेष महत्व रखती हैं। डॉ. मिश्र के अनुसार, 2 नवंबर 1861 को छत्तीसगढ़ को मध्यप्रांत में शामिल किया गया था। इसके बाद 1 नवंबर 1956 को मध्य प्रदेश का गठन हुआ और आगे चलकर 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना। ये तारीखें प्रदेश के प्रशासनिक विकास और ऐतिहासिक बदलावों की महत्वपूर्ण कड़ियां हैं।
छत्तीसगढ़ नाम और भाषा की पहचान को लेकर चिंता
डॉ. मिश्र ने छत्तीसगढ़ शब्द को संक्षिप्त करके ‘छ.ग.’ लिखने पर भी अपनी आपत्ति जताई। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ प्रदेश की विशिष्ट पहचान वाला एक शब्द है, इसलिए इसे अनावश्यक रूप से विभाजित करने से बचना चाहिए। उनके मुताबिक, प्रशासनिक जरूरतों के लिए संक्षिप्त नाम इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन प्रदेश के मूल नाम और उसकी भाषाई पहचान का सम्मान होना चाहिए।
36 बौद्धिक संस्थानों और शिक्षा व्यवस्था को सक्रिय करने की मांग
राज्य स्थापना के 26वें वर्ष में डॉ. मिश्र ने प्रदेश की उच्च शिक्षा और बौद्धिक संस्थाओं की स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कई कॉलेजों में शिक्षकों की कमी है और कुछ संस्थान सीमित स्टाफ के सहारे संचालित हो रहे हैं। उनके अनुसार, उन्होंने शासन को लगभग 36 ऐसे बौद्धिक संस्थानों की सूची सौंपी थी, जो करीब आठ वर्षों से खाली पड़े हैं या अपेक्षित रूप से काम नहीं कर रहे हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रंथ अकादमी, शोधपीठों और अन्य अकादमिक संस्थानों को सक्रिय करने की जरूरत बताई।
छत्तीसगढ़ के इतिहास पर शोध में डॉ. मिश्र का योगदान
डॉ. मिश्र ने बताया कि उन्होंने छत्तीसगढ़ से संबंधित विषयों पर लगभग 36 पीएचडी शोध करवाए हैं। इसके अलावा एमफिल सहित कुल 211 शोधार्थियों के साथ काम किया है। उनका मानना है कि छत्तीसगढ़ी भाषा, इतिहास, संस्कृति और परंपराओं पर व्यवस्थित शोध तथा दस्तावेजीकरण होना चाहिए। इससे आने वाली पीढ़ियों को प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत को समझने का अवसर मिलेगा।
वीर नारायण सिंह के बलिदान दिवस पर सरकारी छुट्टी की मांग
डॉ. मिश्र ने सरकार से मांग की है कि वीर नारायण सिंह के बलिदान दिवस पर शासकीय अवकाश घोषित किया जाए। साथ ही प्रदेश, संभाग और जिला स्तर पर संगोष्ठियों का आयोजन किया जाए, ताकि वीर नारायण सिंह, गुंडाधुर और दूसरे जनजातीय बलिदानियों के योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सके।
स्थापना दिवस पर विरासत को सहेजने का संकल्प जरूरी
छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं, बल्कि अपने इतिहास, संस्कृति और संघर्षों को याद करने का भी दिन है। दक्षिण कोसल की प्राचीन पहचान से लेकर 36 गढ़ों की परंपरा, आदिवासी विद्रोहों और अलग राज्य आंदोलन तक प्रदेश ने लंबा सफर तय किया है। अब चुनौती इस विरासत को संरक्षित करने, शिक्षा और शोध संस्थानों को मजबूत बनाने तथा आने वाली पीढ़ियों तक छत्तीसगढ़ की असली पहचान पहुंचाने की है।


