Freedom of Religion Act 2026 : बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026 और छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता नियम 2026 की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई। वीएन प्रसाद राव एवं अन्य की ओर से दायर याचिका में नए कानून के विभिन्न प्रावधानों को मौलिक अधिकारों के विपरीत बताया गया है। मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता हर्षमंदर रस्तोगी के माध्यम से याचिका प्रस्तुत की गई।
याचिकाकर्ताओं ने मौलिक अधिकारों का दिया हवाला
मामले की वर्चुअल सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर और अन्य अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा। दलील दी गई कि कानून के कुछ प्रावधान नागरिकों की अंतःकरण की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता और निजता से जुड़े संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित करते हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान उसके निजी जीवन और व्यक्तिगत गरिमा से जुड़ी होती है।
धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया को बताया जटिल
याचिका में दावा किया गया है कि कानून के तहत स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति के लिए भी कई प्रशासनिक प्रक्रियाएं अनिवार्य की गई हैं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, प्रस्तावित धर्म परिवर्तन के सार्वजनिक प्रकाशन के साथ विभिन्न विभागों और अधिकारियों के समक्ष प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है। उनका आरोप है कि इस प्रक्रिया में लंबा समय लग सकता है और यह व्यक्तिगत निर्णय में अत्यधिक प्रशासनिक हस्तक्षेप की स्थिति पैदा करता है।
धर्मांतरण कराने वालों के लिए पंजीकरण का प्रावधान
याचिका में धर्म परिवर्तन कराने वाले व्यक्ति या पुरोहित के लिए अनिवार्य पंजीकरण के प्रावधान पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि धार्मिक गतिविधियों से जुड़े व्यक्तियों पर इस तरह की अनिवार्यता उनके धार्मिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, इन प्रावधानों को लेकर अंतिम संवैधानिक स्थिति अदालत के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी।
सख्त सजा के प्रावधानों पर आपत्ति
याचिकाकर्ताओं ने कानून में निर्धारित कठोर दंडात्मक प्रावधानों को भी चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि कानून और नियमों की जटिलता के कारण स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन के मामलों में भी संबंधित व्यक्तियों पर कार्रवाई का जोखिम बन सकता है। याचिकाकर्ताओं ने न्यूनतम सात वर्ष की सजा से लेकर आजीवन कारावास और भारी जुर्माने से जुड़े प्रावधानों पर विशेष आपत्ति जताई है।
धार्मिक स्थलों को लेकर भी उठाए सवाल
याचिका में धार्मिक स्थलों से संबंधित प्रशासनिक कार्रवाई का मुद्दा भी उठाया गया है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि कानून के कुछ अस्पष्ट प्रावधानों के आधार पर धार्मिक एवं पूजा स्थलों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। उनका कहना है कि ऐसी परिस्थितियों में लोगों के धार्मिक आचरण और पूजा-अर्चना की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट की युगल पीठ ने अंतरिम राहत से संबंधित आवेदन पर छत्तीसगढ़ सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने राज्य सरकार को अपना पक्ष दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है। फिलहाल अदालत ने याचिका में लगाए गए आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
आगे की सुनवाई पर टिकी नजर
अब मामले में अगली सुनवाई के दौरान राज्य सरकार अपना जवाब अदालत के सामने रखेगी। इसके बाद याचिकाकर्ताओं की दलीलों और सरकार के पक्ष पर अदालत आगे विचार कर सकती है। धर्म स्वतंत्रता कानून से जुड़े प्रावधानों को लेकर इससे पहले भी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं सामने आ चुकी हैं। अगस्त 2026 में एक अन्य मामले में हाईकोर्ट के समक्ष 2026 के कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।
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