Hell Chicken: जब भी डायनासोर की बात होती है, लोगों के दिमाग में विशालकाय और खूंखार मांसाहारी जीवों की तस्वीर उभरती है। खासकर नुकीले दांतों वाले टायरानोसॉरस रेक्स (T-Rex) को सबसे खतरनाक शिकारी माना जाता है। लेकिन वैज्ञानिकों ने अमेरिका में एक ऐसे डायनासोर के जीवाश्म का अध्ययन किया है, जो उसी दौर में धरती पर रहता था, मगर उसका भोजन मांस नहीं बल्कि फल हो सकता था। इस अनोखे जीव का नाम इन्फर्नोगैलस जेम्साई (Infernugallus jamesi) है। इसे वैज्ञानिक दुनिया में ‘हेल चिकन’ यानी ‘नरक का मुर्गा’ कहा जा रहा है।
हेल चिकन नाम के पीछे छिपी है खास कहानी
इस डायनासोर का नाम दो लैटिन शब्दों से मिलकर बना है। ‘इन्फर्नो’ का अर्थ नरक और ‘गैलस’ का मतलब मुर्गा होता है। इसका संबंध अमेरिका के मोंटाना राज्य में स्थित हेल क्रीक फॉर्मेशन से है, जहां इसके जीवाश्म मिले थे। यह इलाका प्राचीन डायनासोर के अवशेषों के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। वहीं, इसके नाम में शामिल ‘जेम्साई’ शब्द वैज्ञानिक जेम्स विलियम बॉयड के सम्मान में रखा गया, जिनसे जुड़ी पारिवारिक प्रेरणा ने जीवाश्म विज्ञान में शोधकर्ता की रुचि बढ़ाई थी।

2011 में मिला था जीवाश्म, सालों की रिसर्च के बाद खुला राज
इस अनोखे डायनासोर का जीवाश्म जुलाई 2011 में मोंटाना में खुदाई के दौरान मिला था। इसमें लगभग पूरी और आपस में जुड़ी हुई खोपड़ी के साथ कंकाल के कुछ हिस्से भी सुरक्षित मिले थे। छोटे डायनासोर के इतने अच्छे जीवाश्म मिलना बेहद दुर्लभ माना जाता है। वैज्ञानिकों ने कई वर्षों तक इसके अवशेषों का बारीकी से अध्ययन किया। जीवाश्म वैज्ञानिक ग्रेगरी फनस्टन के नेतृत्व में हुई इस रिसर्च की रिपोर्ट प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ में प्रकाशित हुई है। फिलहाल इसके जीवाश्म कनाडा के रॉयल ओंटारियो म्यूजियम में रखे गए हैं।

बड़े टर्की जितना था आकार, शरीर पर मौजूद थे पंख
वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक, हेल चिकन का आकार एक बड़े टर्की के बराबर था। इसका वजन लगभग 12 किलोग्राम बताया गया है। यह दो पैरों पर चलता था और इसके शरीर पर पंख मौजूद थे। इसके मुंह की बनावट चोंच जैसी थी। देखने में यह किसी विशाल तोते या शुतुरमुर्ग जैसा दिखाई देता होगा। यह लगभग 6.8 से 6.6 करोड़ साल पहले क्रेटेशियस काल के अंतिम दौर में रहता था। इसी समय धरती पर T-Rex और ट्राइसेराटॉप्स जैसे विशाल डायनासोर भी मौजूद थे।
दांत नहीं होने से वैज्ञानिकों को मिला फल खाने का संकेत
इस खोज में सबसे महत्वपूर्ण सुराग हेल चिकन के जबड़े से मिला। इसकी खोपड़ी में दांत नहीं थे। वैज्ञानिकों ने CT स्कैन की मदद से जबड़े और खोपड़ी की आंतरिक संरचना का अध्ययन किया। जांच में पता चला कि इसका जबड़ा आगे-पीछे खिसक सकता था। इसकी बनावट आधुनिक तोते के जबड़े जैसी थी, जो कठोर मांस काटने के बजाय नरम चीजों को कुचलने में मदद करती है।

पेट में पत्थर नहीं मिलने से मजबूत हुआ फलाहार का अनुमान
वैज्ञानिकों को इसके पेट के आसपास गैस्ट्रोलिथ यानी निगले हुए छोटे पत्थर भी नहीं मिले। कई शाकाहारी जीव सख्त पत्तियों को पचाने के लिए ऐसे पत्थरों का इस्तेमाल करते हैं। इनकी अनुपस्थिति से संकेत मिलता है कि हेल चिकन नरम और गूदेदार भोजन पसंद करता होगा। उस समय उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी हिस्सों में नम जंगल और शुरुआती फूलदार पौधे मौजूद थे। माना जाता है कि आड़ू और चेरी जैसे फल इसके भोजन का हिस्सा रहे होंगे।
मांसाहारी पूर्वजों से विकसित होकर बना फल खाने वाला डायनासोर
इस खोज का सबसे दिलचस्प पहलू इसका विकासक्रम है। हेल चिकन ओविरैप्टोरोसॉर समूह का सदस्य था, जिसके पूर्वज मांसाहारी डायनासोरों से जुड़े थे। समय के साथ इस समूह के कुछ जीवों ने पौधों और फलों को भोजन के रूप में अपनाया। यानी T-Rex के दौर में रहते हुए भी हेल चिकन ने शिकार करने के बजाय फल खाने का अलग रास्ता चुना। यह खोज डायनासोरों के खानपान और विकास को समझने में वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।


