Jagannath Rath Yatra: अडापा बिजे रस्म संपन्न, गुंडिचा मंदिर में विराजमान हुए महाप्रभु

Jagannath Rath Yatra: ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा के दौरान ‘अडापा बिजे’ की पवित्र रस्म पूरी श्रद्धा और पारंपरिक भव्यता के साथ संपन्न हुई। इस अनुष्ठान के तहत भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र, बहन सुभद्रा और सुदर्शन को उनके रथों से गुंडिचा मंदिर के गर्भगृह तक ले जाया गया। ‘पहंडी’ नामक इस पारंपरिक जुलूस के माध्यम से महाप्रभु को रथों से उतारकर अडापा मंडप तक ले जाया गया, जहाँ वे अगले नौ दिनों तक भक्तों को दर्शन देंगे। प्रशासन ने इस संवेदनशील और विशाल धार्मिक आयोजन के लिए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे, साथ ही चिकित्सा की व्यापक व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई ताकि भक्तों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

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गुंडिचा मंदिर में नौ दिनों का प्रवास

जगन्नाथ मंदिर के वरिष्ठ सेवायत नरसिंह प्रतिकार के अनुसार, अडापा बिजे रथ यात्रा का एक बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव है। मान्यता है कि गुंडिचा मंदिर भगवान जगन्नाथ का जन्मस्थान है, जहाँ वे अपनी वार्षिक यात्रा के दौरान नौ दिनों तक निवास करते हैं। रथ यात्रा के दिन से शुरू होकर यह प्रवास ‘बहुड़ा यात्रा’ तक जारी रहता है, जिसके बाद भगवान पुनः अपने मुख्य मंदिर यानी ‘श्रीमंदिर’ की ओर प्रस्थान करते हैं। इस दौरान भक्त अपने आराध्य के अडापा मंडप पर दर्शन करने के लिए उमड़ पड़ते हैं, जिसे ‘अडपा दर्शन’ के रूप में जाना जाता है।

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अनुष्ठान की विशिष्ट प्रक्रिया और परंपराएं

अडापा बिजे की रस्म बेहद जटिल और गौरवशाली है। इस अनुष्ठान को शुरू करने से पहले रथों से घोड़ों को हटाया जाता है और नारियल के पेड़ों के तनों से बने विशेष ‘चारमाल’ (ढलान युक्त सीढ़ी) लगाए जाते हैं। इन चारमालों के माध्यम से ही महाप्रभु को ‘पहंडी’ शैली में अडापा मंडप तक पहुँचाया जाता है और उन्हें रत्न सिंहासन पर विराजमान कराया जाता है। सेवायत नरसिंह प्रतिकार का कहना है कि भगवान की सेवा करने का अवसर मिलना करोड़ों पुण्यों के बराबर है। इस दिव्य कार्य को संपन्न करने के लिए विभिन्न प्रकार के सेवायतों का समन्वय आवश्यक होता है, जो सदियों पुरानी इस परंपरा को अक्षुण्ण बनाए हुए हैं।

सेवायतों की महत्वपूर्ण भूमिका

इस धार्मिक अनुष्ठान को सफल बनाने में अलग-अलग सेवायतों की विशिष्ट भूमिका होती है। भगवान के पीछे रहने वाले सेवक, उनके भुजाओं को सहारा देने वाले दैतापति सेवायत और पूरे जुलूस का मार्गदर्शन करने वाले प्रतिहारी सेवायत मिलकर इस परंपरा को जीवंत रखते हैं। यह समन्वय ही श्री जगन्नाथ संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। सदियों से चली आ रही यह प्रक्रिया न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह टीम वर्क और अनुशासन का एक अनूठा उदाहरण भी है। पूरे कार्यक्रम के दौरान गुंडिचा मंदिर का वातावरण भक्तिमय भजनों और ‘जय जगन्नाथ’ के जयघोष से गुंजायमान रहा।

लाखों भक्तों की आस्था और सुरक्षा व्यवस्था

अडापा बिजे के अवसर पर पुरी में लाखों भक्तों की भीड़ उमड़ी। भक्तों का मानना है कि इन नौ दिनों के प्रवास के दौरान भगवान के दर्शन करने से सभी कष्टों का निवारण होता है। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने मंदिर परिसर और पूरे शहर में सुरक्षा का एक सुरक्षा कवच तैयार किया था। सीसीटीवी कैमरों की निगरानी और बड़ी संख्या में पुलिस बलों की तैनाती ने आयोजन को शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने में मदद की। नौ दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में भगवान के विभिन्न रूपों का दर्शन करना भक्तों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव होता है।

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Chandan Das

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