Agriculture Tips : हर साल देश के करोड़ों किसान भाई मानसून का इंतजार पलकें बिछाकर करते हैं, क्योंकि हमारी खेती पूरी तरह वर्षा जल पर निर्भर करती है। लेकिन इस साल मौसम वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने सामान्य से कम बारिश होने की आशंका जताई है, जिसने अन्नदाताओं की चिंता को थोड़ा बढ़ा दिया है। समय पर पर्याप्त पानी न मिलने से फसलों के विकास, कुल पैदावार और किसानों की शुद्ध आमदनी पर सीधा असर पड़ सकता है। हालांकि, कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि इस स्थिति में घबराने या निराश होने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। अगर सही तकनीक, सटीक जल प्रबंधन और फसलों की उन्नत देखभाल की जाए, तो सूखे जैसी स्थिति में भी तगड़ा मुनाफा कमाया जा सकता है।

सामान्य से कम मानसूनी बारिश ने क्यों बढ़ाई कृषि जगत की चिंता?
विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मौसम एजेंसियों के ताजा अनुमानों के मुताबिक, इस साल मानसून का प्रदर्शन थोड़ा कमजोर रह सकता है। आंकड़े बताते हैं कि इस सीजन में कुल वर्षा सामान्य के मुकाबले सिर्फ 90 प्रतिशत तक ही सिमट सकती है, जिसे कृषि विज्ञान में सूखे के शुरुआती संकेत के रूप में देखा जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ कुल बारिश का आंकड़ा ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि यह भी बेहद जरूरी है कि बारिश सही समय पर और खेती-बाड़ी वाले मुख्य क्षेत्रों में समान रूप से हो। यदि देश के प्रमुख कृषि बेल्ट में समय पर पानी मिल जाता है, तो इस संभावित नुकसान को बहुत हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

तपती गर्मी और लू के बीच फसलों को बचाने का अचूक नुस्खा
वर्तमान में देश के कई राज्यों में भीषण गर्मी और जानलेवा लू (Heat Wave) का प्रकोप जारी है। इस बदलते और कड़े मौसम में धान, मक्का, गन्ना, दलहन (दालें) और पशुओं के हरे चारे जैसी मुख्य फसलों पर सबसे ज्यादा खतरा मंडरा रहा है। ऐसे संकट के समय में कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि वे खेतों को पूरी तरह सूखने न दें, बल्कि समय-समय पर हल्की सिंचाई (Light Irrigation) करते रहें। ऐसा करने से मिट्टी के भीतर की आवश्यक नमी बरकरार रहती है, जिससे पौधों की जड़ों को लगातार पोषण मिलता है और फसलें झुलसाने वाली तेज धूप का डटकर मुकाबला कर पाती हैं।
कम पानी में मिट्टी की नमी और फसलों का स्वास्थ्य कैसे बचाएं?
यदि लंबे समय तक खेतों में पानी नहीं पहुंचता, तो मिट्टी की ऊपरी परतें चटकने लगती हैं, जिससे पौधों की ग्रोथ रुक जाती है। कई बार तेज धूप के कारण फसलें इस कदर झुलस जाती हैं कि उन्हें दोबारा जीवित करना नामुमकिन हो जाता है। इसलिए, किसानों को सलाह दी जाती है कि वे जरूरत के हिसाब से स्प्रिंकलर या ड्रिप सिस्टम से हल्की सिंचाई करें। ध्यान रहे कि खेत में जरूरत से ज्यादा पानी जमा न होने पाए; जलभराव से जड़ें सड़ सकती हैं और फसलों में फंगस या अन्य बीमारियां लगने का खतरा काफी बढ़ जाता है।
आधुनिक नैनो यूरिया और एनपीके स्प्रे से बढ़ाएं पौधों की ताकत
कम पानी की स्थिति में पारंपरिक खादों की जगह आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना बेहद फायदेमंद साबित होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, संकट के समय पौधों को सीधे पोषण देने के लिए नैनो यूरिया, नैनो डीएपी और घुलनशील एनपीके (NPK) का सीधे पत्तियों पर छिड़काव (Foliar Spray) करना चाहिए। यह लिक्विड फर्टिलाइजर सीधे पौधों द्वारा सोख लिया जाता है, जिससे उन्हें आंतरिक मजबूती मिलती है। यह स्प्रे पत्तियों के तापमान को भी नियंत्रित रखता है, जिससे लू का असर बेअसर हो जाता है और फसलें विपरीत परिस्थितियों में भी हरी-भरी और स्वस्थ बनी रहती हैं।

खेतों की मेड़ों पर पेड़ लगाने से होगा दीर्घकालिक सुरक्षा और लाभ
कृषि वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि पारंपरिक कृषि वानिकी (Agroforestry) इस संकट का एक बेहतरीन और परमानेंट इलाज है। खेतों की मेड़ों या किनारों पर ऊंचे और छायादार पेड़ लगाने से वे एक प्राकृतिक दीवार की तरह काम करते हैं। ये पेड़ चारों तरफ से आने वाली गर्म और शुष्क हवाओं (लू) की रफ्तार को धीमा कर देते हैं, जिससे खेत का माइक्रो-क्लाइमेट सुधरता है। जब सीधी लू फसलों तक नहीं पहुंचती, तो मिट्टी से पानी का वाष्पीकरण कम होता है और नमी लंबे समय तक सुरक्षित रहती है, जो भविष्य में खेती को अधिक टिकाऊ और मुनाफेदार बनाती है।
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