Coal Block Auction Protest : छत्तीसगढ़ के कोरबा क्षेत्र में प्रस्तावित कोल ब्लॉक नीलामी को लेकर ग्रामीणों और आदिवासी समुदायों के बीच विरोध तेज होने लगा है। तौलीपाली, कलगामार, मदवानी और कोलगा-बताती समेत कुल 13 गांवों के ग्रामीण इस प्रक्रिया के खिलाफ एकजुट होने का दावा कर रहे हैं। उनका कहना है कि खनन परियोजनाओं से उनके पारंपरिक जीवन, आजीविका, संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। ग्रामीणों के अनुसार, उनकी चिंताओं और सहमति को पर्याप्त महत्व दिए बिना आगे बढ़ने वाली योजनाएं स्थानीय समुदायों के भविष्य को प्रभावित कर सकती हैं। इस मुद्दे पर गांवों में बैठकों का दौर जारी है और ग्रामीण अपनी मांगों को संगठित तरीके से सरकार तक पहुंचाने की तैयारी कर रहे हैं।

‘जल, जंगल और जमीन’ की रक्षा के लिए आंदोलन
ग्रामीणों ने अपनी बैठकों में जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा को प्रमुख मुद्दा बनाया है। उनका कहना है कि प्राकृतिक संसाधन केवल आर्थिक संपत्ति नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति, परंपराओं और आजीविका का आधार हैं। स्थानीय लोगों को आशंका है कि यदि क्षेत्र में कोयला खदानें शुरू होती हैं, तो पर्यावरण, जल स्रोतों, वन क्षेत्रों और कृषि गतिविधियों पर असर पड़ सकता है। ग्रामीणों का मानना है कि इन संभावित प्रभावों को ध्यान में रखे बिना कोई फैसला नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे अपने अधिकारों और पर्यावरण की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रखेंगे।

ग्रामसभा के अधिकारों को लेकर भी उठाए सवाल
आंदोलन से जुड़े ग्रामीणों ने ग्रामसभा की भूमिका और स्थानीय समुदायों की सहमति के सवाल को भी प्रमुखता से उठाया है। उनका कहना है कि खनन से संबंधित फैसलों में प्रभावित गांवों की आवाज सुनी जानी चाहिए और संभावित सामाजिक तथा पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन किया जाना चाहिए। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी चिंताओं की अनदेखी हुई, तो आंदोलन का दायरा बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, ग्रामसभा की सहमति और कानूनी प्रक्रियाओं से संबंधित वास्तविक स्थिति को समझने के लिए संबंधित सरकारी आदेशों, नीलामी दस्तावेजों और लागू नियमों की पुष्टि आवश्यक है।
चार कोल ब्लॉकों की नीलामी रद्द करने का प्रस्ताव
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 13 गांवों के निवासियों ने बैठक में प्रस्ताव पारित कर केंद्र और राज्य सरकार से क्षेत्र के चार कोल ब्लॉकों की प्रस्तावित नीलामी रद्द करने की मांग की है। ग्रामीणों ने आंदोलन को व्यवस्थित बनाने के लिए स्थानीय स्तर पर अध्यक्ष और सचिव की जिम्मेदारियों वाली समितियां गठित करने की भी बात कही है। उनका उद्देश्य गांवों के बीच समन्वय बनाए रखना और अपनी मांगों को साझा मंच के माध्यम से उठाना है। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक उनकी चिंताओं पर ठोस चर्चा नहीं होती, तब तक वे विरोध जारी रखेंगे।
मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन तेज करने की चेतावनी
बैठक के अंत में ग्रामीणों ने अपनी जमीन, जंगलों और जल स्रोतों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया। उन्होंने कहा कि यदि सरकार उनकी मांगों पर ध्यान नहीं देती है, तो वे बड़े स्तर पर शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक प्रदर्शन कर सकते हैं। इस विरोध ने एक बार फिर औद्योगिक विकास, पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज कर दी है। अब निगाहें प्रशासन और संबंधित सरकारी विभागों की प्रतिक्रिया पर हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ग्रामीणों की मांगों पर बातचीत होती है या आंदोलन आगे और व्यापक रूप लेता है।


