Mahabharat: द्वापर युग में हुए महाभारत का युद्ध भारतीय इतिहास और धार्मिक परंपराओं में सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है। 18 दिनों तक चले इस युद्ध में कौरवों और पांडवों के बीच भीषण संघर्ष हुआ, जिसमें अंततः पांडवों को विजय प्राप्त हुई। महाभारत केवल एक युद्ध की कथा नहीं, बल्कि राजनीति, धर्म, कर्तव्य, रिश्तों, त्याग, अहंकार और कूटनीति का विस्तृत ग्रंथ माना जाता है। इस महागाथा के अनेक पात्र आज भी चर्चा का विषय बने रहते हैं। उन्हीं प्रमुख पात्रों में से एक था गांधार का राजकुमार और कौरवों का मामा शकुनि, जिसे महाभारत की घटनाओं का महत्वपूर्ण सूत्रधार माना जाता है।

दुर्योधन का सबसे बड़ा सलाहकार माना जाता था शकुनि
धार्मिक कथाओं के अनुसार, शकुनि ने बचपन से ही दुर्योधन के मन में पांडवों के प्रति ईर्ष्या और वैर की भावना को बढ़ावा दिया। उसकी कूटनीति और चालाकी ने कौरव-पांडव संघर्ष को और गहरा कर दिया। माना जाता है कि दुर्योधन को हर परिस्थिति में पांडवों के खिलाफ खड़ा करने में शकुनि की महत्वपूर्ण भूमिका थी। हालांकि, कई कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि उसके मन में हस्तिनापुर के प्रति गहरा आक्रोश था और वह अपने परिवार के साथ हुए कथित अन्याय का बदला लेना चाहता था। यही कारण बताया जाता है कि उसने दुर्योधन को अपने उद्देश्य का माध्यम बनाया।

क्या शकुनि हमेशा से दुष्ट था?
महाभारत से जुड़ी कई लोककथाओं और प्रचलित मान्यताओं में कहा गया है कि शकुनि जन्म से दुष्ट या षड्यंत्रकारी नहीं था। वह अपनी बहन गांधारी से अत्यंत स्नेह करता था और चाहता था कि उसका विवाह एक योग्य और सक्षम राजकुमार से हो। लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनीं कि गांधारी का विवाह हस्तिनापुर के नेत्रहीन राजकुमार धृतराष्ट्र से हुआ। कुछ कथाओं में इसका कारण भीष्म पितामह की राजनीतिक इच्छा और हस्तिनापुर की शक्ति को बताया गया है। हालांकि, महाभारत के विभिन्न संस्करणों में इस प्रसंग का वर्णन अलग-अलग रूपों में मिलता है।
परिवार के साथ कारागार में बंद होने की कथा
लोकमान्यताओं के अनुसार, विवाह के बाद धृतराष्ट्र को गांधारी से जुड़ी कुछ बातों का पता चला, जिसके बाद उन्होंने गांधार राज्य पर आक्रमण करवा दिया। कहा जाता है कि गांधारी के पिता राजा सुबल, शकुनि और उनके परिवार के अन्य सदस्यों को बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया गया। कथाओं के अनुसार, उन्हें बहुत कम भोजन दिया जाता था, जिससे वे धीरे-धीरे भूख से मर जाएं। इस कठिन परिस्थिति में परिवार ने निर्णय लिया कि उपलब्ध भोजन केवल शकुनि को दिया जाए, ताकि वह जीवित रहकर भविष्य में अपने परिवार के साथ हुए अन्याय का प्रतिकार कर सके।
शकुनि की टांग टूटने की प्रचलित मान्यता
प्रचलित धार्मिक कथाओं के अनुसार, शकुनि के पिता राजा सुबल ने उसे एक विशेष उद्देश्य के साथ जीवित रहने का संदेश दिया। मान्यता है कि उन्होंने अपनी शक्ति से शकुनि की एक टांग तोड़ दी, ताकि जीवनभर चलते समय उसे अपने परिवार पर हुए कथित अत्याचार की याद बनी रहे। इसी कारण आगे चलकर शकुनि लंगड़ाकर चलता था। यह कथा कई लोकपरंपराओं और मौखिक वर्णनों में सुनाई जाती है, हालांकि महाभारत के सभी प्रामाणिक संस्करणों में इसका समान उल्लेख नहीं मिलता।
बदले की भावना से जुड़ी मानी जाती है यह कहानी
कई धार्मिक व्याख्याओं में कहा जाता है कि शकुनि की टूटी हुई टांग केवल शारीरिक चोट नहीं, बल्कि उसके जीवनभर के संकल्प का प्रतीक थी। माना जाता है कि वह हस्तिनापुर से बदला लेने की भावना को कभी भूल न सके, इसलिए उसे यह पीड़ा हमेशा याद दिलाती रही। इसी कारण उसने दुर्योधन को प्रभावित किया और कौरव-पांडव संघर्ष को निर्णायक मोड़ तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि, यह विवरण मुख्य रूप से लोककथाओं और प्रचलित मान्यताओं पर आधारित है।
धार्मिक कथाओं के अलग-अलग संस्करण
महाभारत से जुड़े अनेक प्रसंगों की तरह शकुनि की लंगड़ी टांग की कहानी के भी विभिन्न संस्करण प्रचलित हैं। कुछ कथाओं में इसे ऐतिहासिक घटना की तरह बताया गया है, जबकि कई विद्वान इसे लोकमान्यता और प्रतीकात्मक कथा मानते हैं। इसलिए इस प्रसंग को धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए। महाभारत की विभिन्न व्याख्याएं अलग-अलग ग्रंथों, लोककथाओं और परंपराओं में भिन्न रूप से मिलती हैं, इसलिए श्रद्धालु और पाठक इसे आस्था और परंपरा के दृष्टिकोण से समझते हैं।
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