Pithori Amavasya 2026 : हिंदू धर्म में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को विशेष आध्यात्मिक महत्व दिया गया है। इस अमावस्या को अलग-अलग क्षेत्रों में पिठोरी अमावस्या, भाद्रपद अमावस्या, पोला अमावस्या और मातृ अमावस्या के नाम से जाना जाता है। महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में अमांत पंचांग का पालन किया जाता है, इसलिए वहां इसे श्रावण अमावस्या के रूप में भी मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत और पूजा करने से संतान की रक्षा और परिवार की खुशहाली की कामना की जाती है।
2026 में कब मनाई जाएगी पिठोरी अमावस्या
पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में पिठोरी अमावस्या का व्रत 10 सितंबर, गुरुवार को रखा जाएगा। अमावस्या तिथि की शुरुआत 10 सितंबर को सुबह 10 बजकर 33 मिनट पर होगी, जबकि इसका समापन 11 सितंबर, शुक्रवार को सुबह 8 बजकर 56 मिनट पर होगा। अमावस्या तिथि 10 सितंबर को होने के कारण इसी दिन व्रत और पूजन किया जाएगा।
प्रदोष काल में पूजा का शुभ समय
पिठोरी अमावस्या के दिन देवी की पूजा के लिए प्रदोष काल को भी शुभ माना गया है। 10 सितंबर 2026 को प्रदोष काल का समय शाम 6 बजकर 32 मिनट से रात 8 बजकर 51 मिनट तक रहेगा। इस अवधि में माताएं देवी पिठोरी की विधि-विधान से पूजा कर सकती हैं। पूजा के दौरान संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की समृद्धि की कामना की जाती है।
क्या है पिठोरी अमावस्या की परंपरा
पिठोरी अमावस्या मुख्य रूप से माताओं के लिए महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। धार्मिक और लोक मान्यताओं के अनुसार, माताएं अपनी संतान की सुरक्षा, अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना के लिए इस दिन व्रत रखती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में इस पर्व की पूजा विधि और नाम में कुछ अंतर देखने को मिलता है, लेकिन इसका प्रमुख भाव संतान की कुशलता और परिवार की खुशहाली से जुड़ा है।
आटे से क्यों बनाई जाती हैं देवी की प्रतिमाएं
पिठोरी अमावस्या के नाम के पीछे भी एक विशेष धार्मिक परंपरा बताई जाती है। पिठोरी शब्द को संस्कृत के ‘पिष्टक’ शब्द से जोड़कर देखा जाता है, जिसका अर्थ आटे या चूर्ण से बनाई गई आकृति या पिंड माना जाता है। इस दिन आटे से देवी पिठोरी की प्रतिमा बनाने की परंपरा है। इसके साथ 64 योगिनियों और सप्त मातृकाओं की आकृतियां भी तैयार की जाती हैं और फिर श्रद्धा के साथ उनका पूजन किया जाता है।
देवी पिठोरी और 64 योगिनियों की पूजा
इस पर्व पर मुख्य रूप से देवी पिठोरी की पूजा की जाती है। धार्मिक परंपराओं में 64 योगिनियों और सप्त मातृकाओं का भी विशेष महत्व बताया गया है। पूजा से पहले घर और पूजा स्थान की साफ-सफाई की जाती है। इसके बाद आटे से देवी की प्रतिमा और अन्य निर्धारित आकृतियां बनाकर उनकी पूजा की जाती है। देवी को फल, फूल, मिठाई और अपनी श्रद्धा के अनुसार अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है।
संतान की सुरक्षा के लिए रखा जाता है व्रत
पिठोरी अमावस्या को संतान की सुरक्षा और परिवार की खुशहाली से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करने से देवी का आशीर्वाद संतान पर बना रहता है। माताएं अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य, लंबी आयु और उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करती हैं। कई परिवारों में यह व्रत लंबे समय से चली आ रही पारिवारिक और धार्मिक परंपरा के रूप में मनाया जाता है।
पीढ़ियों से चली आ रही है धार्मिक परंपरा
पिठोरी अमावस्या केवल पूजा और व्रत का अवसर नहीं, बल्कि कई परिवारों में पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और परंपरा का हिस्सा भी है। इस दिन माताएं देवी पिठोरी, 64 योगिनियों और सप्त मातृकाओं का स्मरण करते हुए संतान और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धा और विधि-विधान से की गई पूजा परिवार में सुख-समृद्धि और मंगल की कामना से जुड़ी मानी जाती है।
Read More : Vishwakarma Jayanti 2026: क्यों मनाई जाती है विश्वकर्मा जयंती? जानें भगवान विश्वकर्मा की कथा और महत्व