Pitru Paksha 2025: 7 सितंबर 2025 से शुरू हो रहा है पितृ पक्ष, जिसे हिंदू धर्म में दिवंगत पितरों की आत्मा की शांति के लिए बेहद पवित्र माना जाता है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलने वाले इन 16 दिनों के पखवाड़े में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व होता है।

हालांकि श्राद्ध कहीं भी किया जा सकता है, लेकिन बिहार राज्य के गया जी को पिंडदान का सबसे बड़ा और फलदायक तीर्थ माना गया है। मान्यता है कि यहां पिंडदान करने से पितरों के सात जन्मों तक का उद्धार होता है।

गया जी का धार्मिक महत्व
गया जी फल्गु नदी के तट पर स्थित एक प्राचीन तीर्थस्थल है। यहां पिंडदान करने से न केवल पितरों को शांति मिलती है, बल्कि कर्ता को भी जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है। पुराणों में उल्लेख है: ‘श्राद्धारंभे गयां ध्यात्वा ध्यात्वा देवं गदाधरम्।’ (श्राद्ध की शुरुआत गया और भगवान गदाधर के स्मरण से करनी चाहिए।) श्राद्ध चाहे काशी, प्रयाग या किसी अन्य तीर्थ में हो, गया जी का स्मरण आवश्यक माना गया है।
क्यों खास है गया जी? गयासुर की कथा से जुड़ा रहस्य
गया जी का नाम एक पौराणिक असुर गयासुर के नाम पर पड़ा, जो अत्यंत तपस्वी और धार्मिक था। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे वरदान दिया कि वह ब्रह्मा, देवता और ऋषियों से भी अधिक पवित्र बन जाएगा।
इस वरदान के चलते गयासुर के शरीर को स्पर्श करने मात्र से लोगों को स्वर्ग की प्राप्ति होने लगी। देवता चिंतित हो उठे। तब ब्रह्मा जी ने यज्ञ करने हेतु गयासुर की पवित्र देह को भूमि के रूप में मांगा।
यज्ञ के दौरान जब गयासुर की देह हिलने लगी, तो भगवान विष्णु ने अपनी गदा और चरणों से उसे स्थिर कर दिया। यज्ञ पूर्ण होने पर उन्होंने गयासुर को मोक्ष का वरदान दिया और घोषणा की कि जहां-जहां उसकी देह फैली है, वो स्थान पितरों के उद्धार के लिए पवित्र तीर्थ होंगे।
यही कारण है कि गया को गयातीर्थ, देवतीर्थ और पितृतीर्थ कहा जाता है।
क्या लाभ होता है गया में पिंडदान से?
पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है
वंशजों की बाधाएं समाप्त होती हैं
कुल के दोषों का नाश होता है
सात पीढ़ियों तक के पूर्वजों का उद्धार होता है
आत्मा को परम शांति मिलती है
Pitru Paksha 2025 की शुरुआत 7 सितंबर से हो रही है, और यह 22 सितंबर तक चलेगा। यदि आपके पूर्वज दिवंगत हैं, तो इस पवित्र काल में गया जी में पिंडदान करना अत्यंत पुण्यदायक माना गया है। यह न केवल एक धार्मिक कर्तव्य है, बल्कि आत्मिक शांति और कुल की उन्नति का भी मार्ग है। गया जी की धरती पर पिंडदान करना, वास्तव में एक मोक्षदायी कर्म है, जिसकी महिमा वेद-पुराणों में भी वर्णित है।










