Punjab Congress Crisis
Punjab Congress Crisis: पंजाब की राजनीति में कांग्रेस कभी सबसे मजबूत स्तंभ मानी जाती थी, लेकिन 2022 की चुनावी हार के जख्म अभी भरे नहीं थे कि पार्टी एक बार फिर आपसी सिरफुटौवल के दौर में पहुँच गई है। पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान सांसद चरणजीत सिंह चन्नी के एक ताजा बयान ने पार्टी के भीतर जातिगत विवाद को हवा दे दी है। चन्नी ने अनुसूचित जाति (SC) विंग की बैठक में अपनी ही पार्टी पर दलितों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व न देने का आरोप लगाया। उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वे कहते नजर आ रहे हैं कि राज्य में 35-38 प्रतिशत दलित आबादी होने के बावजूद अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष और अन्य प्रमुख पदों पर ‘अपर कास्ट’ का कब्जा है।
पंजाब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने चन्नी के आरोपों पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। वड़िंग ने घर की बात घर में रखने की सलाह देते हुए चन्नी को आईना दिखाया। उन्होंने कहा कि अगर कांग्रेस में जातिवाद होता, तो चन्नी कभी मुख्यमंत्री नहीं बन पाते। वड़िंग ने याद दिलाया कि पार्टी ने कई वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर चन्नी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी थी। उन्होंने तंज कसते हुए यह भी कहा कि चन्नी मुख्यमंत्री रहते हुए दो सीटों से चुनाव लड़े और दोनों ही जगह से हार गए। वड़िंग के इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जट्ट सिख समुदाय और दलित प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर पार्टी के भीतर दरार काफी गहरी हो चुकी है।
विवाद बढ़ता देख चरणजीत सिंह चन्नी अब बचाव की मुद्रा में हैं। उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि उनके खिलाफ झूठा प्रोपेगेंडा फैलाया जा रहा है और वे सभी समुदायों का सम्मान करते हैं। हालांकि, इस कलह का फायदा उठाने के लिए भाजपा सक्रिय हो गई है। केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वहां केवल गांधी परिवार की चलती है और अपमानित महसूस कर रहे कांग्रेसी नेताओं को भाजपा जैसी ‘अच्छी पार्टी’ में शामिल हो जाना चाहिए। भाजपा के इस खुले न्योते ने कांग्रेस आलाकमान की चिंता और बढ़ा दी है।
पंजाब कांग्रेस के बिखराव को रोकने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। बघेल पंजाब में सक्रिय होकर नेताओं के बीच समन्वय बिठाने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने साफ संकेत दिया है कि 2027 का विधानसभा चुनाव पार्टी बिना किसी ‘मुख्यमंत्री चेहरे’ (CM Face) के लड़ेगी। बघेल की मध्यस्थता का असर दिखने लगा है, जहाँ नवजोत कौर सिद्धू जैसी मुखर नेता फिलहाल शांत हैं और ‘मनरेगा बचाओ’ रैलियों के माध्यम से पार्टी के विभिन्न गुटों को एक मंच पर लाने की कोशिश की जा रही है।
वर्तमान में स्थिति यह है कि पंजाब कांग्रेस के दिग्गज नेता जैसे राजा वड़िंग, सुखजिंदर सिंह रंधावा और चन्नी सार्वजनिक रूप से तो एकजुटता का दावा कर रहे हैं, लेकिन अंदरूनी खींचतान जारी है। रंधावा और वड़िंग अब यह कहने लगे हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री के नाम से फर्क नहीं पड़ता, बस सरकार कांग्रेस की बननी चाहिए। हालांकि, आलाकमान ने अभी तक नेतृत्व परिवर्तन पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है। 2027 के चुनाव से पहले अगर पार्टी अपनी आंतरिक गुटबाजी और जातिगत राजनीति को खत्म नहीं करती, तो 2022 जैसी स्थिति दोबारा पैदा होने का डर बना हुआ है।
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