RSS BJP Relations : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 वर्ष पूरे होने के बाद संगठन की भूमिका और भविष्य को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। राजनीतिक विश्लेषण में सवाल उठाया जा रहा है कि क्या केंद्र और कई राज्यों में बीजेपी की सत्ता मजबूत होने के बाद संघ का प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा? लंबे समय तक बीजेपी के विपक्ष में रहने के दौरान संघ ने संगठन विस्तार, विचारधारा के प्रचार और सामाजिक गतिविधियों पर जोर दिया था। लेकिन सत्ता में आने के बाद दोनों संगठनों के संबंधों में बदलाव दिखाई देने की चर्चा है।

बीजेपी सरकार में संघ के कई पुराने एजेंडे पूरे
बीते वर्षों में बीजेपी सरकार ने अनुच्छेद 370 हटाने और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाए। समान नागरिक संहिता को लेकर भी राजनीतिक बहस जारी है। इसके अलावा शिक्षा और विभिन्न संस्थानों में वैचारिक बदलाव को लेकर भी चर्चाएं होती रही हैं। इन उपलब्धियों के बावजूद सवाल उठ रहा है कि अब संघ का अगला वैचारिक और सामाजिक एजेंडा क्या होगा?

2024 के चुनाव ने बीजेपी की ताकत पर उठाए सवाल
2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 240 सीटें मिलीं, जबकि पार्टी ने चुनाव प्रचार के दौरान 400 पार का नारा दिया था। पार्टी को सरकार बनाने के लिए सहयोगी दलों का समर्थन लेना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस नतीजे ने बीजेपी के सामने नई चुनौतियां खड़ी कीं। लेख में सवाल उठाया गया है कि क्या संघ चुनावी नुकसान की भरपाई करने और जनता के बीच पार्टी का विश्वास मजबूत करने में अपेक्षित भूमिका निभा पाया?
क्या RSS की भूमिका बीजेपी को चुनाव जिताने तक सीमित?
संघ लंबे समय से सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से अपनी विचारधारा का प्रसार करता रहा है। विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, सेवा भारती और विद्या भारती जैसे संगठनों के जरिए भी उसका नेटवर्क सक्रिय है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषण में यह सवाल उठ रहा है कि क्या अब संघ की प्राथमिक भूमिका अलग-अलग राज्यों में बीजेपी के लिए चुनावी माहौल तैयार करने तक सीमित होती जा रही है?
श्यामा प्रसाद मुखर्जी से बीजेपी के गठन तक की कहानी
संघ और राजनीति के रिश्ते का इतिहास काफी पुराना है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने संघ से राजनीतिक पार्टी बनाने का आग्रह किया था, लेकिन तत्कालीन सरसंघचालक एमएस गोलवलकर ने संघ को सांस्कृतिक संगठन बनाए रखने की प्राथमिकता दी। इसके बाद भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता संघ की पृष्ठभूमि से आए। बाद में दोहरी सदस्यता के विवाद के बीच 1980 में बीजेपी का गठन हुआ।

नड्डा के बयान से बढ़ी थी राजनीतिक हलचल
2024 के चुनाव प्रचार के दौरान तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था कि शुरुआती दौर में पार्टी को संघ की जरूरत थी, लेकिन अब बीजेपी अपने दम पर सक्षम हो चुकी है। उनके इस बयान को दोनों संगठनों के बदलते रिश्तों के संकेत के रूप में देखा गया। हालांकि, बाद में इस बयान को लेकर सफाई भी दी गई थी।
मोहन भागवत के बयानों से नई बहस
संघ प्रमुख मोहन भागवत के युवाओं और आंदोलनों से जुड़े बयानों को लेकर भी राजनीतिक चर्चा होती रही है। एक तरफ उन्होंने युवाओं की बात सुनने और आंदोलन को लोकतंत्र का हिस्सा बताया, वहीं दूसरी तरफ विदेशी साजिशों और सरकार बदलने की कथित कोशिशों को लेकर भी चिंता जताई। इन बयानों को लेकर संघ और सरकार के विचारों में समानता तथा अंतर पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
नई पीढ़ी और बदलती अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती
बेरोजगारी, महंगाई, आर्थिक चुनौतियां, एआई और रोजगार में बदलाव जैसे मुद्दे नई पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में सवाल है कि संघ इन विषयों पर बीजेपी सरकार को कौन-सा वैचारिक रोडमैप दे रहा है। राजनीतिक टिप्पणी के अनुसार, बीजेपी की सत्ता और चुनावी रणनीति के बीच संघ की स्वतंत्र पहचान तथा सामाजिक भूमिका को लेकर नई बहस खड़ी हो रही है।
क्या RSS को अपनी पहचान बचाने की जरूरत है?
बीजेपी एक राजनीतिक पार्टी है, जबकि संघ स्वयं को सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है। लेकिन दोनों के पुराने वैचारिक संबंधों को देखते हुए उनकी भूमिकाओं में बदलाव पर चर्चा स्वाभाविक है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या संघ भविष्य में अपनी स्वतंत्र वैचारिक पहचान और प्रभाव को पहले की तरह बनाए रख पाएगा?


