अंतरराष्ट्रीय

Russia Cucumber Price Hike: रूस में ‘नया सोना’ बना खीरा, मीट से भी ज्यादा महंगी हुई सब्जियां, सोशल मीडिया पर ‘गोल्डन ककड़ी’ का तहलका

Russia Cucumber Price Hike: रूस और यूक्रेन के बीच लंबे समय से जारी भीषण युद्ध के बीच अब रूस के भीतर एक अजीबोगरीब आर्थिक संकट गहरा गया है। जहां पूरी दुनिया में निवेशक सोने और चांदी की बढ़ती कीमतों पर नजर गड़ाए हुए हैं, वहीं रूस की आम जनता के लिए ‘खीरा’ (Cucumber) विलासिता की वस्तु बन गया है। देश के भीतर खीरे की कीमतों में आए अचानक और बेतहाशा उछाल ने आम नागरिकों के बजट को पूरी तरह बिगाड़ दिया है। हालात ऐसे हैं कि रूसी नागरिक अब सोशल मीडिया पर खीरे की तुलना सोने और कीमती रत्नों से कर रहे हैं। खीरे की कमी और उसकी भारी कीमत ने युद्ध की मार झेल रहे रूसी समाज में एक नई तरह की चिंता पैदा कर दी है।

दिसंबर से कीमतों में आया 100% का उछाल

‘इंडिपेंडेंट’ की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, रूस के सुपरमार्केट में खीरे की कीमतें दिसंबर माह के बाद से दोगुनी हो चुकी हैं। वर्तमान में खीरे की औसत कीमत लगभग 300 रूबल (भारतीय मुद्रा में करीब 356 रुपये) प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। हालांकि, देश के कुछ हिस्सों में विशेष किस्म के खीरे इससे दो या तीन गुना अधिक ऊंचे दामों पर बिक रहे हैं। इस बेतहाशा महंगाई से परेशान रूसी नागरिक अब ‘डार्क ह्यूमर’ का सहारा ले रहे हैं। सोशल मीडिया पर महंगी सब्जियों की तस्वीरें साझा की जा रही हैं, जिनमें खीरे को किसी लग्जरी कार या गहने की तरह प्रदर्शित किया जा रहा है।

मीट और विदेशी फलों से भी महंगा हुआ खीरा

‘फोर्ब्स रूस’ ने अपनी रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला तथ्य साझा किया है। फरवरी 2026 की शुरुआत तक रूस में खीरे की कीमतें चिकन और मीट के बराबर या उनसे भी ज्यादा हो गई हैं। कई सुपरमार्केट में स्थिति यह है कि स्थानीय रूप से उगने वाले खीरे, विदेशों से आयात होने वाले केलों और अन्य फलों से भी महंगे मिल रहे हैं। यह मुद्दा अब केवल बाजार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि रूस की राजनीति में भी गरमा गया है। ‘जस्ट रशिया’ पार्टी के नेता सर्गेई मिरोनाव ने सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि जनता को बुनियादी भोजन के लिए इतना संघर्ष करना पड़ रहा है, जो किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।

कीमतें बढ़ने के मुख्य कारण: युद्ध और अर्थव्यवस्था

रूस में खीरे के इस तरह ‘सोने’ के भाव बिकने के पीछे कई जटिल कारण हैं:

  • युद्ध आधारित अर्थव्यवस्था: रूस का पूरा ध्यान वर्तमान में सैन्य उत्पादन पर है, जिससे गैर-सैन्य क्षेत्रों (जैसे कृषि) में निवेश घटा है और कीमतें बढ़ी हैं।

  • श्रमिकों का भारी अभाव: युद्ध में सैनिकों की भर्ती (ड्राफ्टिंग) के कारण खेतों और ग्रीनहाउस इंडस्ट्री में काम करने वाले मजदूरों की भारी कमी हो गई है।

  • टैक्स में वृद्धि: 1 जनवरी 2026 से रूस में वैल्यू-एडेड टैक्स (VAT) को 20% से बढ़ाकर 22% कर दिया गया है, जिसका सीधा असर उपभोक्ता वस्तुओं पर पड़ा है।

  • सर्दियां और बिजली की लागत: कृषि मंत्रालय इसे मौसमी उतार-चढ़ाव बता रहा है, क्योंकि सर्दियों में ग्रीनहाउस चलाने के लिए बिजली का खर्च बढ़ जाता है।

भविष्य की उम्मीद: क्या कम होंगे दाम?

हालांकि रूसी कृषि मंत्रालय का कहना है कि यह केवल मौसमी प्रभाव है, लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह युद्धकालीन महंगाई का प्रत्यक्ष परिणाम है। रूस के खुदरा विक्रेता (Retailers) अब उम्मीद कर रहे हैं कि अगले महीने जैसे ही मौसम में थोड़ी गर्मी आएगी और उत्पादन बढ़ेगा, कीमतों में कुछ गिरावट देखी जा सकती है। फिलहाल, रूसी जनता को एक मामूली सलाद के लिए भी अपनी जेब काफी ढीली करनी पड़ रही है, जो सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है।

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