Subhash Chandra Bose : देश की आज़ादी के लिए लड़ते हुए कई नेताओं ने अपनी-अपनी भूमिका निभाई, लेकिन शायद ही कोई ऐसा नेता होगा जिसने सुभाष चंद्र बोस जितनी बहुमुखी और जुझारू भूमिका निभाई हो। गांधीजी के अहिंसा के मार्ग से अलग होकर सशस्त्र संघर्ष को अपनाने वाले नेताजी ने अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति, साहस और रणनीतिक कुशलता से आजादी के आंदोलन को एक नया आयाम दिया। आइए, नेताजी की इस अनूठी यात्रा को विस्तार से समझें।
1939 में सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर पुनः कब्ज़ा किया, हालांकि यह महात्मा गांधी की इच्छा के विपरीत था। उनकी इस जीत को गांधीजी ने अपनी हार माना था। जल्दी ही बोस को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा और कांग्रेस से उनका अलगाव स्पष्ट हो गया। दोनों नेताओं के बीच विचारधाराओं का फर्क बढ़ गया था। बोस मानते थे कि अंग्रेज़ सरकार आज़ादी आसानी से नहीं देगी, इसके लिए सशस्त्र संघर्ष करना होगा। वहीं गांधीजी का अहिंसात्मक मार्ग बना रहा।
जेल में बंद रहते हुए बोस ने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई के लिए नई रणनीति तैयार की। 1940 में उन्होंने महात्मा गांधी को बंगाल कांग्रेस की फूट खत्म करने के लिए बिना शर्त सहयोग की पेशकश की, लेकिन गांधीजी ने जवाब दिया कि “हमारे मतभेद बुनियादी हैं। जब तक हम एक-दूसरे के रंग में रंग नहीं जाते, हमारे रास्ते अलग रहेंगे।”
कलकत्ता की प्रेसीडेंसी जेल में बंद नेताजी ने ब्रिटेन विरोधी शक्तियों के साथ संपर्क बनाने का निर्णय लिया। नवंबर 1940 में काली पूजा के दिन उन्होंने आमरण अनशन शुरू किया, जिससे उनकी तबीयत बिगड़ी। प्रशासन ने उनके स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें अस्थायी तौर पर रिहा किया। इसी के बाद 17 जनवरी 1941 को उन्होंने वेश बदलकर जेल से फरार होने का सफल प्रयास किया।
मुश्किल हालातों में वह पेशावर, काबुल और सोवियत संघ होते हुए अप्रैल 1941 में जर्मनी पहुंचे। जर्मनी में उन्होंने भारत की आज़ादी के लिए सहयोग मांगा, लेकिन जब जर्मनी ने सोवियत संघ पर हमला किया तो बोस ने सोवियत संघ के प्रति सहानुभूति जताई। इस बीच, वे ब्रिटिश सेना में भर्ती भारतीय सैनिकों को बगावत के लिए प्रेरित करने की रणनीति पर काम कर रहे थे।
1943 में जापान के सिंगापुर में इंडियन नेशनल आर्मी (INA) की कमान उन्होंने अपने हाथों में ली। रास बिहारी बोस ने इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की अध्यक्षता नेताजी को सौंप दी। नेताजी ने युद्ध के अगले चरण की शुरुआत का आह्वान किया और कहा, “ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ शस्त्र उठाएं।”
5 जुलाई 1943 को सिंगापुर टाउन हॉल में नेताजी ने आजाद हिंद फौज के सुप्रीम कमांडर के रूप में शपथ ली। उन्होंने देशवासियों को संबोधित करते हुए कहा कि आजादी पाने के लिए खून बहाना पड़ेगा। उनके उद्घोष ‘दिल्ली चलो!’ ने पूरे देश में एक नई ऊर्जा और विश्वास पैदा किया।
21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में नेताजी की अध्यक्षता में अंतरिम आजाद हिंद सरकार का गठन हुआ, जिसे जापान, जर्मनी, इटली समेत नौ देशों ने मान्यता दी। इस सरकार ने ब्रिटेन और उसके सहयोगी अमेरिका के खिलाफ युद्ध का ऐलान किया। साथ ही, महिलाओं के लिए ‘रानी झांसी रेजिमेंट’ का गठन किया गया, जो इतिहास में पहला महिला सेना दस्ते का उदाहरण था।
नेताजी ने दिसंबर 1943 में जापान के कब्जे में रहे अंडमान-निकोबार द्वीप समूह को आजाद हिंद सरकार के अधीन घोषित किया। उन्होंने इसे ‘शहीद द्वीप समूह’ और ‘स्वराज द्वीप समूह’ नाम दिए। इस कदम से आजाद हिंद फौज और सरकार का उत्साह बढ़ा।
जनवरी 1944 में रंगून में आजाद हिंद सरकार का मुख्यालय स्थापित किया गया। फरवरी 1944 में आजाद हिंद फौज ने अराकान मोर्चे पर ब्रिटिश सेना के साथ पहली बार युद्ध किया और महत्वपूर्ण विजय हासिल की। मार्च 1944 में नेताजी ने घोषणा की कि फौज भारत में प्रवेश कर चुकी है। इम्फाल और कोहिमा की लड़ाई में भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने बहादुरी दिखाई, लेकिन कठिन मौसम और आपूर्ति की कमी के कारण पीछे हटना पड़ा।
6 जुलाई 1944 को रंगून रेडियो से अपने संबोधन में नेताजी ने गांधीजी को पहली बार ‘राष्ट्रपिता’ कहकर संबोधित किया और उनकी आशीर्वाद की कामना की। उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रिटिश सरकार भारत को आज़ाद नहीं करेगी, इसलिए संघर्ष का रास्ता खून से होकर जाएगा।
हालांकि अगस्त 1945 में अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराकर जापान को युद्ध हारना पड़ा। इसके बाद आजाद हिंद फौज की लड़ाई भी अस्थायी रूप से समाप्त हो गई।
18 अगस्त 1945 को नेताजी ताइवान के लिए रवाना हुए, लेकिन 23 अगस्त को टोक्यों रेडियो ने बताया कि उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और उसी रात उनकी मृत्यु हो गई। यह खबर आज भी विवादों में है और कई लोग नेताजी के जीवित होने की संभावना पर विश्वास करते हैं।
सुभाष चंद्र बोस ने स्वतंत्रता संग्राम में अहिंसा के अलावा सशस्त्र संघर्ष की दिशा को मजबूती दी। उनके अथक प्रयासों और अदम्य साहस ने आज़ाद हिंद फौज को प्रेरित किया और देशवासियों में आज़ादी की उम्मीद जगाई। “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा” का नारा आज भी हर भारतीय के दिल में उत्साह भरता है। नेताजी की कहानी केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि देशभक्ति और साहस की मिसाल है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
Stock Market Crash : भारतीय शेयर बाजार के निवेशकों के लिए 30 अप्रैल 2026 की…
IPL 2026 Orange Cap : इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) के मौजूदा सीजन में जहां एक…
Cyber Crime Bribery : छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा साइबर अपराधियों के विरुद्ध चलाए जा रहे अभियानों…
London Terror Attack : इंग्लैंड की राजधानी लंदन एक बार फिर सांप्रदायिक हिंसा और आतंक…
Middle East Tension : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ जारी अमेरिकी नौसैनिक…
MP Road Accident : मध्य प्रदेश के धार जिले में बुधवार की रात एक रूह…
This website uses cookies.