Syria election 2025: सीरिया में करीब 14 साल बाद हुए संसदीय चुनाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में सवाल उठने लगे हैं। चुनाव को लोकतंत्र की दिशा में “पहला कदम” बताया गया, लेकिन सबसे बड़ी गैरमौजूदगी आम जनता की रही, जिसने इस चुनाव को ‘लोकतांत्रिक प्रक्रिया’ की जगह ‘राजनीतिक औपचारिकता’ बना दिया।

जनता और राजनीतिक दल दोनों बाहर
इस चुनाव में न तो आम जनता को मतदान का अधिकार मिला और न ही स्वतंत्र राजनीतिक दलों को खुलकर चुनाव लड़ने का मौका। 210 सदस्यीय संसद में दो-तिहाई यानी 140 सीटों पर मतदान मात्र 7 हजार चयनित सदस्यों ने किया, जिन्हें सरकारी जिला समितियों ने नामित किया था। शेष 70 सीटों पर स्वयं अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा द्वारा नियुक्त सदस्य बैठेंगे। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह चुनाव है या सत्ता को वैधता देने की एक सजावटी प्रक्रिया?

शरा की जीत पहले से तय?
पिछले साल दिसंबर में बशर अल-असद शासन के तख्तापलट के बाद अहमद अल-शरा ने अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में सत्ता संभाली थी। उन्होंने वादा किया था कि यह चुनाव “लोकतंत्र की ओर पहला कदम” होगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि उनकी जीत पहले से तय मानी जा रही है, क्योंकि न तो जनता को सीधे वोट देने का मौका मिला, न ही विपक्षी दलों को स्वतंत्र चुनाव प्रचार का।
अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की राय
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि यह चुनाव सीरिया में राजनीतिक बदलाव का चेहरा तो हो सकता है, लेकिन बिना जनभागीदारी के यह एकतरफा सत्ता परिवर्तन मात्र है। लोकतंत्र की बुनियादी शर्त जनता की भागीदारी होती है, जो इस प्रक्रिया में नदारद रही। कई विशेषज्ञों ने इसे “लोकतंत्र की आड़ में सत्ता को वैध ठहराने का प्रयास” करार दिया है।
गृहयुद्ध और राजनीतिक अस्थिरता की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि सीरिया बीते 13 वर्षों से भीषण गृहयुद्ध और बशर अल-असद की तानाशाही का दंश झेलता रहा है। लाखों लोगों की मौत, विस्थापन और आर्थिक बदहाली के बीच यह चुनाव एक “नई शुरुआत” के तौर पर पेश किया गया, लेकिन इसमें वास्तविक परिवर्तन का अभाव स्पष्ट रूप से नजर आता है।सीरिया का यह चुनाव लोकतंत्र की ओर उठाया गया कदम नहीं, बल्कि जनता को हाशिए पर रखकर सत्ता को वैधता देने की कवायद ज्यादा नजर आता है। जब जनता को मतदान का हक न हो, तो ऐसा चुनाव लोकतंत्र नहीं, बल्कि दिखावे की राजनीति बनकर रह जाता है।











