US Iran Tensions : ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार समारोह में भारत ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर दोनों देशों के बीच के ऐतिहासिक और मजबूत संबंधों को फिर से रेखांकित किया है। भारत के विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा और बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन ने भारत सरकार की ओर से तेहरान में खामेनेई को अंतिम श्रद्धांजलि दी। तेहरान की सड़कों पर जब खामेनेई का ताबूत ले जाया जा रहा था, तब दुनिया की नजरें इस आयोजन पर टिकी थीं। ईरान ने इस कठिन समय में भारत के समर्थन का विशेष उल्लेख करते हुए आभार प्रकट किया है, विशेषकर ऐसे समय में जब कई अन्य देश अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव के कारण इस कार्यक्रम से दूर रहे।

अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत का दृढ़ कूटनीतिक रुख
ईरान की तस्नीम न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने एक सोची-समझी कूटनीतिक मुहिम चलाई थी ताकि विभिन्न देशों को इस अंतिम संस्कार से दूर रखा जा सके। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने स्वयं खाड़ी के कई देशों से संपर्क कर उन्हें तेहरान न जाने की सलाह दी थी। चेतावनी दी गई थी कि इस समारोह में शामिल होना अमेरिका के प्रति दुश्मनी के समान माना जाएगा और इससे मिलने वाली सहायता में भी कटौती की जा सकती है। इस भारी अमेरिकी दबाव के चलते कम से कम 13 देश या तो कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए या उन्होंने अपनी उपस्थिति नाममात्र की रखी। इन देशों में पूर्वी यूरोप, अफ्रीका और पूर्वी एशिया के राष्ट्र शामिल हैं।

ईरानी दूतावास का भारत के प्रति आभार
ईरानी दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट कर भारत सरकार और भारतीय जनता का हृदय से शुक्रिया अदा किया। दूतावास ने कहा कि भारत की यह भागीदारी दोनों देशों के बीच सदियों पुरानी मित्रता और सम्मान का प्रतीक है। आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल के अलावा, जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद और विभिन्न धर्मों के धार्मिक नेताओं ने भी तेहरान पहुंचकर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं। ईरान ने स्पष्ट किया कि भारत का यह मानवीय और मैत्रीपूर्ण रुख उनके देश के लोग कभी नहीं भूलेंगे और यह भविष्य में द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का आधार बनेगा।

खाड़ी देशों की कूटनीति और अमेरिका का कड़ा रवैया
खाड़ी क्षेत्र के कूटनीतिक समीकरणों में भी इस दौरान काफी हलचल देखी गई। जहां एक तरफ सऊदी अरब, कतर और ओमान ने अमेरिकी दबाव की परवाह न करते हुए अपने आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल ईरान भेजे, वहीं संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कुवैत और बहरीन जैसे देश इस कार्यक्रम से पूरी तरह दूर रहे। अमेरिका की ओर से इन देशों पर डाले गए दबाव के कारण कूटनीतिक गलियारों में काफी खींचतान देखने को मिली। हालांकि, अमेरिकी विदेश विभाग या मार्को रुबियो के कार्यालय की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी तक जारी नहीं की गई है, लेकिन यह घटना अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखी जा रही है।
संबंधों का नया आधार: भारत-ईरान की पुरानी दोस्ती
ईरान और भारत के बीच का यह कूटनीतिक सामंजस्य दोनों देशों की रणनीतिक स्वायत्तता को दर्शाता है। एक ऐसे वैश्विक माहौल में जहां ध्रुवीकरण तेजी से बढ़ रहा है, भारत ने अपने हितों और अपने पुराने मित्र देशों के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी है। ईरान द्वारा भारत को ‘थैंक्यू’ कहना केवल औपचारिक शिष्टाचार नहीं है, बल्कि यह उस मजबूत आधार को स्वीकार करना है जिस पर दोनों देशों की विदेश नीति टिकी है। आने वाले समय में, यह घटना भारत और ईरान के बीच आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग को और अधिक प्रगाढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
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