Black Sea Dolphins Death : रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध का असर अब केवल इंसानों और शहरों तक सीमित नहीं रह गया है। काला सागर में समुद्री जीवों पर भी युद्ध का गंभीर प्रभाव देखने को मिल रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक 1 लाख 20 हजार से अधिक डॉल्फिन की मौत हो चुकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि सैन्य उपकरणों की आवाज, मिसाइल विस्फोट और पनडुब्बियों की गतिविधियों ने समुद्री जीवों के प्राकृतिक जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है।
2022 से लगातार हो रही डॉल्फिन की मौत
अल-जजीरा को दिए एक साक्षात्कार में दक्षिणी यूक्रेन के तुजली लैगून नेशनल पार्क के मुख्य शोधकर्ता इवान रुसेव ने इस संकट की जानकारी दी। उनके मुताबिक, फरवरी 2022 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन द्वारा यूक्रेन पर पूर्ण सैन्य हमला शुरू किए जाने के बाद से बड़ी संख्या में डॉल्फिन की मौत हुई है। समुद्र तटों पर लगातार मृत और घायल डॉल्फिन मिलने की घटनाएं सामने आ रही हैं।

सैन्य सोनार तकनीक से प्रभावित हो रही डॉल्फिन की इकोलोकेशन
शोधकर्ताओं के मुताबिक, युद्धपोतों और पनडुब्बियों में इस्तेमाल होने वाली सैन्य तकनीक डॉल्फिन के जीवन के लिए बड़ा खतरा बन गई है। डॉल्फिन इकोलोकेशन नामक प्राकृतिक क्षमता का इस्तेमाल करके आवाज की तरंगों के जरिए रास्ता खोजती हैं, एक-दूसरे से संपर्क करती हैं और शिकार पकड़ती हैं। लेकिन सैन्य सोनार और तेज विस्फोटों से पैदा होने वाली ध्वनि तरंगें उनकी इस क्षमता को प्रभावित करती हैं। इसके कारण डॉल्फिन दिशाहीन हो जाती हैं और भोजन तलाशने में परेशानी का सामना करती हैं।

भूख और जहरीले रसायनों से कमजोर हो रहा शरीर
विशेषज्ञों के अनुसार, जब डॉल्फिन लंबे समय तक शिकार नहीं कर पातीं तो उनके शरीर का वजन तेजी से घटने लगता है। ऊर्जा हासिल करने के लिए उनका शरीर जमा वसा का इस्तेमाल करने लगता है। लेकिन काला सागर में मौजूद प्लास्टिक, एंटीबायोटिक और औद्योगिक रसायनों जैसे प्रदूषकों के कारण इस वसा में पहले से जहरीले तत्व जमा हो सकते हैं। वसा के टूटने पर ये हानिकारक पदार्थ शरीर में फैलते हैं, जिससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। इसके बाद कई डॉल्फिन गंभीर श्वसन संक्रमण की चपेट में आकर दम तोड़ देती हैं।
मछली पकड़ने के जाल भी बन रहे हैं मौत की वजह
युद्ध के अलावा मछली पकड़ने वाले जाल भी डॉल्फिन के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। कई समुद्री जीव जाल में फंसकर सांस नहीं ले पाने के कारण मर जाते हैं। कुछ मामलों में मछुआरे जाल से डॉल्फिन को निकालने के लिए उनके पंख काट देते हैं। इसके बाद घायल और क्षत-विक्षत डॉल्फिन के शव समुद्र तटों पर पहुंचते हैं।

युद्ध के रसायनों से पूरा समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में
युद्धक विमानों, ड्रोन और पनडुब्बियों से निकलने वाले ईंधन तथा रासायनिक प्रदूषण ने काला सागर के पारिस्थितिकी तंत्र को भी प्रभावित किया है। खाद्य श्रृंखला में सबसे ऊपर रहने वाली डॉल्फिन के साथ मछलियों की कई प्रजातियों की संख्या घटने की आशंका है। पानी के भीतर होने वाले विस्फोट और अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण समुद्री जीवों की सुनने की क्षमता को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं।
प्रवासी पक्षियों के सामने भी भोजन का संकट
समुद्र में मछलियों की उपलब्धता घटने से उन प्रवासी पक्षियों पर भी असर पड़ रहा है, जो भोजन के लिए समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भर रहते हैं। उत्तर यूरोप से मध्य पूर्व की ओर जाने वाले पक्षियों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा है। इससे लंबी यात्रा के दौरान उनकी मौत का खतरा बढ़ सकता है। विशेषज्ञों को आशंका है कि इसका असर आने वाले वर्षों में पक्षियों के प्रजनन और उनकी आबादी पर भी दिखाई दे सकता है।
मृत डॉल्फिन देखकर रो पड़ा आठ साल का बच्चा
समुद्र तटों पर मृत और घायल डॉल्फिन मिलने की घटनाओं ने यूक्रेन के स्थानीय लोगों को भावुक कर दिया है। ओडेसा शहर की निवासी तेतियाना स्मोलचेंको ने बताया कि समुद्र तट पर सड़ी हुई डॉल्फिन का शव देखकर उनका आठ साल का बच्चा रोने लगा। उन्होंने कहा कि युद्ध में इंसानों की मौत की खबरें सुनने की आदत भले हो गई हो, लेकिन इन बेजुबान समुद्री जीवों की दर्दनाक मौत देखकर आंसू रोकना मुश्किल है।


