Vikram-1 Success: भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में विक्रम-1 की ऐतिहासिक उड़ान के बाद स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) अब अपने अगले बड़े मिशन की तैयारियों में जुट गई है। शनिवार को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से भारत के पहले प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट ने सफलतापूर्वक उड़ान भरकर इतिहास रच दिया। इस रॉकेट ने लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में पेलोड को सटीक रूप से स्थापित किया, जिससे भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र वैश्विक मानचित्र पर और मज़बूत हुआ है। इस मिशन की सफलता न केवल कंपनी के एडवांस्ड कंपोजिट स्ट्रक्चर और 3D-प्रिंटेड इंजन टेक्नोलॉजी की जीत है, बल्कि यह आत्मनिर्भर भारत के सपनों को भी नई उड़ान देने वाली है।

कमर्शियल लॉन्च के लिए कमर कस रही स्काईरूट
स्काईरूट एयरोस्पेस के सीईओ पवन कुमार चंदाना ने कंपनी के भविष्य के रोडमैप पर से पर्दा उठा दिया है। उनका कहना है कि अब कंपनी का प्राथमिक लक्ष्य कमर्शियल स्पेस लॉन्च को नियमित करना है। चंदाना ने स्पष्ट किया कि विक्रम-1 की सफलता के बाद अब उनका ध्यान उन ग्राहकों की ज़रूरतों को पूरा करने पर है, जो अपने सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजना चाहते हैं। कंपनी वर्तमान में अगले चरण के रॉकेट, यानी ‘विक्रम-2’ के विकास पर भी तेज़ी से काम कर रही है, जो भविष्य की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है।

‘स्पेस की उबर’ बनने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य
स्काईरूट की कार्यप्रणाली को लेकर सीईओ पवन कुमार चंदाना की एक पुरानी तुलना फिर से चर्चा का विषय बनी है। उन्होंने स्काईरूट को “स्पेस के लिए उबर” (Uber for Space) के रूप में परिभाषित किया है। उन्होंने समझाया कि जिस तरह से लोग अपनी सुविधा और ज़रूरत के अनुसार कैब बुक करते हैं, स्काईरूट का लक्ष्य भी उसी तर्ज पर सैटेलाइट कंपनियों के लिए रॉकेट उपलब्ध कराना है। जहाँ स्पेसएक्स जैसी कंपनियां एक बस या ट्रेन की तरह काम करती हैं, वहीं स्काईरूट अंतरिक्ष में सैटेलाइट भेजने के लिए एक लचीला और ऑन-डिमांड प्लेटफॉर्म प्रदान करना चाहती है।
हर महीने एक रॉकेट बनाने की औद्योगिक क्षमता
कंपनी अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है। पवन कुमार चंदाना ने बताया कि स्काईरूट अपनी प्रोडक्शन यूनिट को इस तरह विकसित कर रही है कि वह हर महीने एक रॉकेट तैयार करने में सक्षम हो सके। यह लक्ष्य हासिल करना कंपनी के लिए ग्लोबल लॉन्च सर्विस प्रोवाइडर बनने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। इसके अलावा, कंपनी के पास पहले से ही यूरोप और अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों से कई ग्राहक मौजूद हैं, जो स्काईरूट की बढ़ती वैश्विक साख को दर्शाता है।
सरकारी सुधारों और वेंडर्स का महत्वपूर्ण योगदान
इस पूरे सफर में भारत सरकार के स्पेस सेक्टर में किए गए सुधारों ने गेम-चेंजर की भूमिका निभाई है। नई स्पेस पॉलिसी और ISRO व IN-SPACe जैसे संस्थानों के निरंतर सहयोग के बिना प्राइवेट कंपनियों के लिए यह मुकाम हासिल करना संभव नहीं था। पवन कुमार चंदाना ने इस सफलता का श्रेय देशभर के 400 से अधिक वेंडर्स को दिया है, जिनके अथक योगदान ने विक्रम-1 को हकीकत में बदला। स्काईरूट अब केवल एक रॉकेट कंपनी नहीं, बल्कि भारत की नई अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का आधारस्तंभ बनने की ओर तेजी से अग्रसर है।
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