केरल के वायनाड जिले में मीनाक्षी पुल के पास भूस्खलन ने चिंता बढ़ा दी है। भारी बारिश के बीच हुए इस हादसे के बाद बचाव दल मौके पर पहुंचकर मलबे में फंसे लोगों की तलाश कर रहे हैं। प्रशासन और राहत एजेंसियां लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
केरल के वायनाड जिले में मीनाक्षी पुल के पास भूस्खलन ने चिंता बढ़ा दी है। भारी बारिश के बीच हुए इस हादसे के बाद बचाव दल मौके पर पहुंचकर मलबे में फंसे लोगों की तलाश कर रहे हैं। प्रशासन और राहत एजेंसियां लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।

Wayanad Landslide : केरल के वायनाड जिले से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है, जहाँ मेप्पाडी इलाके में हुए भीषण भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई है। भारी बारिश के चलते हुए इस हादसे में अब तक 3 लोगों की जान जाने की पुष्टि हुई है, जबकि कई अन्य लोगों के मलबे में फंसे होने की आशंका जताई जा रही है। रेस्क्यू ऑपरेशन पूरी तेजी के साथ जारी है और अब तक बचाव दलों ने 6 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया है।


यह त्रासदी तब हुई जब मीनाक्षी पुल के पास पहाड़ी का एक बड़ा हिस्सा अचानक ढहकर नीचे सड़क और नदी में जा गिरा, जिससे वहां मौजूद निर्माण स्थल पूरी तरह से मलबे के नीचे दब गया।

यह घटना सुबह करीब 10 बजे के आसपास हुई। कलाडी क्षेत्र में मीनाक्षी पुल के पास सुरंग (टनल) निर्माण का कार्य चल रहा था। खुदाई के कारण वहां मिट्टी का एक बड़ा टीला बन गया था, जो लगातार हो रही मूसलधार बारिश के कारण अस्थिर हो गया और अंततः दरक गया।
पहाड़ी का यह हिस्सा इतनी तेजी से नीचे गिरा कि नीचे की ओर बने प्रवासी मजदूरों के अस्थायी कैंप और वहाँ खड़ी दो बसें पूरी तरह मलबे में समा गईं। राहत की बात यह है कि घटना सुबह के समय हुई, जिससे कई मजदूर काम पर जाने की तैयारी में थे और वे समय रहते सुरक्षित स्थानों की ओर भाग निकले, अन्यथा हताहतों की संख्या कहीं अधिक हो सकती थी।
भूस्खलन एक गंभीर प्राकृतिक आपदा है, जिसमें पहाड़ी ढलानों से चट्टानें, मिट्टी, मलबा और गाद अचानक नीचे की ओर खिसक आते हैं। इसके पीछे कई प्राकृतिक कारण होते हैं, जैसे अत्यधिक वर्षा, बर्फ का पिघलना, भूकंपीय गतिविधियां, ज्वालामुखी का फटना या नदियों द्वारा कटाव।

इसके साथ ही, मानवीय हस्तक्षेप जैसे कि अंधाधुंध वनों की कटाई, बड़े पैमाने पर खनन, सड़कों और बांधों का अनियोजित निर्माण और पहाड़ी इलाकों में अनियंत्रित शहरीकरण भूस्खलन के खतरे को कई गुना बढ़ा देते हैं। भूस्खलन के विभिन्न रूप होते हैं, जिनमें रॉक फॉल, स्लाइड, फ्लो और टॉपल जैसी स्थितियां शामिल हैं।
भले ही भूस्खलन एक प्राकृतिक आपदा है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सही नियोजन से इसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। ढलानों पर सघन वृक्षारोपण करना मृदा अपरदन को रोकने में सबसे प्रभावी होता है। इसके अलावा, ढलानों पर ‘रिटेनिंग वॉल’ (सहारा दीवारें) बनाना, उचित जल निकासी (ड्रेनेज) प्रणाली विकसित करना और पहाड़ियों पर ‘नेटिंग’ करना सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यक है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) जैसे संस्थानों द्वारा तैयार किए गए जोखिम मानचित्रों का उपयोग करके उन क्षेत्रों को चिन्हित किया जा सकता है, जहाँ निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित होना चाहिए। समय रहते चेतावनी प्रणाली और कठोर निर्माण नियमों का पालन ही ऐसी जानलेवा त्रासदियों से बचाव का एकमात्र रास्ता है।
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