TMC Leadership : तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर मची बगावत अब पार्टी पर पूर्ण नियंत्रण पाने की खुली जंग में तब्दील हो गई है। पार्टी की कमान आखिर किसके हाथ में रहेगी—संस्थापक ममता बनर्जी के पास या बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी के पास? यह सवाल वर्तमान में पश्चिम बंगाल की राजनीति के केंद्र में है। विवाद तब गहरा गया जब ऋतब्रत बनर्जी ने सोमवार को एक नई ‘नेशनल वर्किंग कमेटी’ का गठन करने की घोषणा की। इस नई सूची से ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी का नाम नदारद है, जबकि अरूप रॉय को नया चेयरमैन नियुक्त किया गया है। ऋतब्रत की इस कवायद ने पार्टी के भीतर जारी सत्ता संघर्ष को और अधिक आक्रामक बना दिया है।

ममता बनर्जी का रणनीतिक पलटवार: चुनाव आयोग को भेजी नई सूची
ऋतब्रत बनर्जी द्वारा अपनी कमेटी के दस्तावेजों को चुनाव आयोग में जमा करने की योजना पर पानी फेरते हुए, ममता बनर्जी ने अत्यंत तत्परता दिखाई है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आयोग को एक आधिकारिक पत्र भेजकर अपनी समर्थक ‘नेशनल वर्किंग कमेटी’ की सूची सौंप दी है। इस 24 सदस्यीय सूची में ममता बनर्जी को पार्टी का चेयरपर्सन और अभिषेक बनर्जी को अखिल भारतीय महासचिव के रूप में दर्ज किया गया है, जबकि अभिषेक को ऋतब्रत गुट द्वारा पहले ही निष्कासित करने का दावा किया गया था। ममता के इस कदम ने कानूनी मोर्चे पर उन्हें स्पष्ट बढ़त दिला दी है।

पदों का बंटवारा और नई संगठनात्मक रणनीति
ममता बनर्जी द्वारा चुनाव आयोग को सौंपी गई सूची में महत्वपूर्ण संगठनात्मक फेरबदल और नियुक्तियां दिखाई गई हैं। इसमें सुब्रत बख्शी को उपाध्यक्ष और सुभाषिश को कोषाध्यक्ष बनाया गया है। इसके अलावा, डोला सेन और डेरेक ओ ब्रायन को संयुक्त सचिव की जिम्मेदारी दी गई है। सूची में शोभनदेव चटर्जी का नाम विधानसभा नेता के तौर पर शामिल है, लेकिन नेता प्रतिपक्ष के पद का कोई जिक्र नहीं किया गया है। मदन मित्रा सहित कई अन्य वरिष्ठ नेताओं के नाम भी इस लिस्ट में हैं, जो यह स्पष्ट करता है कि ममता बनर्जी पार्टी की संगठनात्मक संरचना पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए पूरी तरह आश्वस्त हैं।
विशेषज्ञों की राय: कानूनी लड़ाई और जनता का जनाधार
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस का यह विवाद पूरी तरह से ‘पावर स्ट्रगल’ है। विश्लेषक शुभमय मैत्रा का मानना है कि पार्टी के नाम और सिंबल की कानूनी लड़ाई से इतर, असली परीक्षा आम तृणमूल वोटर की है। यह अभी स्पष्ट नहीं है कि जनता का समर्थन ममता की ओर झुकेगा या ऋतब्रत की ओर। संसद के भीतर भी ममता समर्थक सांसद कीर्ति आजाद और सागरिका घोष ने बागी सांसदों से पहले स्पीकर को अपनी चिट्ठी सौंप दी थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ममता खेमा कानूनी प्रक्रियाओं में बेहद सतर्क है। चुनाव होने तक यह अनिश्चितता बनी रहेगी कि अंततः टीएमसी का असली वारिस कौन बनेगा।
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