NSE-SEBI Settlement : सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के बीच को-लोकेशन और डार्क-फाइबर से जुड़े लंबे समय से चल रहे विवादों के निपटारे को मंजूरी दे दी है। अदालत की मंजूरी के बाद इन मामलों से संबंधित लंबित कानूनी कार्यवाही समाप्त हो गई है। दोनों पक्षों के बीच हुए सेटलमेंट के बाद अब इस मामले में आगे किसी मुकदमे की प्रक्रिया नहीं चलेगी।
NSE ने सेटलमेंट के तहत जमा की बड़ी रकम
न्यूज एजेंसी एएनआई के अनुसार, SEBI के सेटलमेंट नियमों के तहत NSE ने मामलों को समाप्त करने के लिए करीब 1,491.21 करोड़ रुपये की राशि का भुगतान किया है। यह विवाद कई वर्षों से भारतीय पूंजी बाजार में चर्चा का विषय बना हुआ था। मामले के दौरान NSE की ट्रेडिंग व्यवस्था और कुछ ब्रोकर्स को कथित तौर पर मिले विशेष लाभ को लेकर नियामकीय सवाल उठाए गए थे।
को-लोकेशन विवाद में क्या था आरोप
को-लोकेशन मामले में आरोप लगाया गया था कि NSE के कुछ चुनिंदा सदस्यों या ब्रोकर्स को एक्सचेंज के सर्वर के नजदीक अपनी मशीनें लगाने की सुविधा मिली थी। इससे उन्हें बाजार से संबंधित डेटा सामान्य निवेशकों या अन्य प्रतिभागियों की तुलना में तेजी से प्राप्त होने का कथित फायदा मिला। इस व्यवस्था को लेकर यह सवाल उठे थे कि क्या सभी बाजार प्रतिभागियों को समान स्तर की सुविधा और जानकारी उपलब्ध थी।
डार्क-फाइबर मामले में भी उठे थे सवाल
डार्क-फाइबर मामले में आरोप था कि कुछ ब्रोकर्स को ऐसी तेज संचार लाइन का फायदा मिला, जिसके इस्तेमाल के लिए आवश्यक अनुमति या निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। डार्क-फाइबर कनेक्शन के जरिए डेटा को तेजी से पहुंचाने की क्षमता होती है। इसी वजह से बाजार में ऑर्डर और सूचनाओं की गति से जुड़े संभावित लाभ को लेकर नियामकीय जांच और कानूनी विवाद सामने आया था।
2019 में SEBI ने NSE पर लगाया था बड़ा वित्तीय दायित्व
इस मामले में वर्ष 2019 में SEBI ने NSE को करीब 625 करोड़ रुपये की रकम 12 प्रतिशत ब्याज के साथ जमा करने का आदेश दिया था। हालांकि, बाद में सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) ने SEBI के इस आदेश को रद्द कर दिया था। इसके बाद मामला आगे की कानूनी प्रक्रिया में पहुंचा और दोनों पक्षों के बीच विवाद का समाधान लंबे समय तक अदालतों में चलता रहा।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था कानूनी विवाद
डार्क-फाइबर से जुड़े मामलों में SAT के फैसलों के खिलाफ SEBI की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई थी। बाद में इन अपीलों को भी सेटलमेंट के माध्यम से निपटाने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके बाद SEBI ने SAT के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इस तरह को-लोकेशन और डार्क-फाइबर से जुड़े अलग-अलग कानूनी विवाद एक बड़े निपटारे की दिशा में आगे बढ़े।
SEBI ने जुलाई में मंजूर किया सेटलमेंट प्रस्ताव
मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब SEBI ने जुलाई में दोनों विवादों को एक साथ लेते हुए NSE के करीब 1,491 करोड़ रुपये के सेटलमेंट प्रस्ताव को मंजूरी दी। NSE द्वारा निर्धारित राशि जमा किए जाने के बाद नियामक की ओर से समझौते को आगे बढ़ाया गया। इसके बाद अंतिम कानूनी मंजूरी के लिए मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहुंचा, जहां अब सेटलमेंट को मंजूरी मिल गई है।
सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद सभी मामले समाप्त
सेटलमेंट राशि जमा होने और SEBI की मंजूरी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते को स्वीकार कर लिया। अदालत की मंजूरी के साथ को-लोकेशन और डार्क-फाइबर से जुड़े लंबित मामलों को समाप्त कर दिया गया। इस फैसले के बाद NSE के खिलाफ इन विशेष विवादों से जुड़ी वर्षों पुरानी कानूनी प्रक्रिया पर विराम लग गया है।
NSE के लिए कानूनी विवाद खत्म होने से राहत
इन मामलों के निपटारे के बाद NSE को लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद से राहत मिली है। अब एक्सचेंज अपने कारोबारी संचालन, बाजार से जुड़ी रणनीतियों और भविष्य की योजनाओं पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर सकता है। हालांकि, सेटलमेंट का मतलब संबंधित आरोपों पर न्यायिक रूप से दोष या निर्दोषता का अलग से अंतिम निर्धारण नहीं माना जाना चाहिए; यह विवाद को निर्धारित शर्तों के तहत समाप्त करने की प्रक्रिया है।
भारतीय शेयर बाजार के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम
NSE और SEBI के बीच इस समझौते को भारतीय पूंजी बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम माना जा सकता है। वर्षों से लंबित मामलों के समाप्त होने के बाद संबंधित पक्षों के बीच कानूनी अनिश्चितता कम हुई है। सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के साथ अब को-लोकेशन और डार्क-फाइबर विवादों से जुड़े लंबित मामलों पर आगे सुनवाई की आवश्यकता नहीं रहेगी।
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