Chabahar Port
Chabahar Port Dispute: भारत की विदेश नीति और रणनीतिक हितों को लेकर विपक्षी दल कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर एक गंभीर आरोप लगाया है। शुक्रवार को कांग्रेस पार्टी ने एक मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि केंद्र सरकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में आकर ईरान के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट से अपना नियंत्रण छोड़ दिया है। कांग्रेस का कहना है कि यह न केवल एक परियोजना से पीछे हटना है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिकी दबाव के आगे घुटने टेकने जैसा है। पार्टी ने इस मुद्दे को उठाते हुए सरकार की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े किए हैं और इसे देश की जनता के साथ विश्वासघात करार दिया है।
कांग्रेस पार्टी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल (X) के जरिए सरकार को घेरते हुए लिखा कि नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर ट्रंप के आगे समर्पण कर दिया है। पार्टी के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन की नाराजगी से बचने के लिए भारत ने न केवल पोर्ट का ऑपरेशनल कंट्रोल छोड़ दिया, बल्कि संबंधित आधिकारिक वेबसाइट को भी बिना किसी पूर्व सूचना के बंद करवा दिया। कांग्रेस ने आर्थिक नुकसान का मुद्दा उठाते हुए कहा कि इस महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में भारत सरकार ने देश के करदाताओं के लगभग 120 मिलियन डॉलर (करीब 1,000 करोड़ रुपये) निवेश किए थे, जो अब पूरी तरह व्यर्थ हो गए हैं।
कांग्रेस ने प्रधानमंत्री की पिछली घोषणाओं को याद दिलाते हुए तीखा हमला बोला। पार्टी का कहना है कि जब चाबहार पोर्ट का समझौता हुआ था, तब पीएम मोदी ने इसे अपनी सरकार की एक ‘ऐतिहासिक सफलता’ और अर्थव्यवस्था के लिए गेम-चेंजर बताया था। कांग्रेस ने पूछा कि अगर यह प्रोजेक्ट उस समय देश की बड़ी जीत थी, तो आज जब भारत इससे अपना हाथ खींच रहा है, तो प्रधानमंत्री चुप क्यों हैं? विपक्षी दल का तर्क है कि देश को यह जानने का हक है कि इतनी भारी पूंजी और वर्षों की कूटनीतिक मेहनत को अचानक क्यों छोड़ दिया गया।
चाबहार बंदरगाह भारत के लिए केवल एक व्यापारिक केंद्र नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण रणनीतिक एसेट था। कांग्रेस ने याद दिलाया कि यह बंदरगाह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया (सेंट्रल एशिया) तक पहुंचने के लिए सीधा समुद्री मार्ग प्रदान करता था। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसके जरिए भारत, पाकिस्तान की धरती का उपयोग किए बिना सीधे व्यापार कर सकता था। साथ ही, यह चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) को काउंटर करने के लिए भारत का सबसे मजबूत जवाब माना जा रहा था। कांग्रेस ने सवाल किया कि क्या भारत की विदेश नीति अब दिल्ली के बजाय व्हाइट हाउस से संचालित हो रही है?
यह पूरा विवाद ‘ईटी इंफ्रा’ की एक रिपोर्ट के बाद शुरू हुआ, जिसमें कहा गया है कि ईरान में भारत की 10 साल पुरानी भागीदारी अब समाप्ति की कगार पर है। रिपोर्ट के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों को अमेरिका के साथ व्यापार करने पर 25 प्रतिशत टैरिफ का भुगतान करना होगा। हालांकि, अमेरिका ने सितंबर 2025 में ही इस बंदरगाह पर फिर से प्रतिबंध लगाकर भारत की चाल को कमजोर करना शुरू कर दिया था। फिलहाल भारत सरकार ने इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस पर बहस छिड़ गई है।
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