High-Risk Pregnancy : प्रेग्नेंसी के दौरान ‘हाई-रिस्क’ शब्द सुनते ही कई महिलाएं चिंता करने लगती हैं। हालांकि, हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का मतलब यह नहीं है कि मां या बच्चे को निश्चित रूप से कोई गंभीर समस्या होने वाली है। गोरखपुर के रीजेंसी हॉस्पिटल में प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. सौम्या के अनुसार, इसका अर्थ ऐसी गर्भावस्था से है जिसमें मां या शिशु की सेहत पर सामान्य गर्भावस्था की तुलना में अधिक निगरानी और नियमित जांच की आवश्यकता हो सकती है।
समय पर जांच से मिलती है जरूरी जानकारी
हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी में डॉक्टर का मुख्य उद्देश्य संभावित समस्या की समय रहते पहचान करना होता है। महिला की स्थिति के अनुसार जांच और मेडिकल मॉनिटरिंग की योजना बनाई जाती है। इससे यदि गर्भावस्था के दौरान कोई जटिलता सामने आती है, तो उसका समय पर उपचार किया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर डिलीवरी के समय और तरीके को लेकर भी उचित योजना बना सकते हैं।
किन परिस्थितियों में प्रेग्नेंसी हाई-रिस्क हो सकती है?
कुछ महिलाओं में पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं के कारण गर्भावस्था में अतिरिक्त निगरानी की जरूरत पड़ सकती है। इनमें हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और कुछ ऑटोइम्यून बीमारियां शामिल हो सकती हैं। महिला की उम्र भी एक कारक हो सकती है, लेकिन केवल उम्र के आधार पर किसी गर्भावस्था को अपने आप खतरनाक नहीं माना जाता। हर महिला की मेडिकल हिस्ट्री और वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति का अलग-अलग मूल्यांकन जरूरी होता है।
ट्विन्स प्रेग्नेंसी में क्यों बढ़ जाती है निगरानी?
जुड़वा या इससे अधिक बच्चों वाली गर्भावस्था में मां और शिशुओं दोनों पर अतिरिक्त शारीरिक दबाव पड़ सकता है। इसलिए ऐसी प्रेग्नेंसी में डॉक्टर आमतौर पर अधिक नियमित निगरानी की सलाह दे सकते हैं। इसमें बच्चों की ग्रोथ, प्लेसेंटा, ब्लड फ्लो और मां के ब्लड प्रेशर जैसी स्थितियों पर नजर रखी जाती है। जांच की जरूरत प्रत्येक महिला की स्थिति के अनुसार अलग हो सकती है।
स्वस्थ महिला को भी हो सकती है परेशानी
कई बार गर्भावस्था की शुरुआत में महिला पूरी तरह स्वस्थ होती है, लेकिन समय बीतने के साथ कुछ नई स्वास्थ्य समस्याएं सामने आ सकती हैं। प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या प्री-एक्लेम्पसिया जैसी स्थितियां विकसित हो सकती हैं। इसलिए शुरुआती जांच सामान्य आने के बावजूद पूरी प्रेग्नेंसी के दौरान नियमित चेकअप कराना महत्वपूर्ण माना जाता है।
हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी में कौन सी जांच होती है?
हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी में जांच की संख्या और अंतराल महिला की स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर तय किए जाते हैं। डॉक्टर नियमित ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर की जांच के साथ ब्लड टेस्ट और अल्ट्रासाउंड की सलाह दे सकते हैं। आवश्यकता के अनुसार बच्चे की हार्टबीट, ग्रोथ और ब्लड फ्लो की भी निगरानी की जा सकती है। हर महिला के लिए एक जैसी जांच जरूरी नहीं होती।
हाई-रिस्क शब्द से घबराने की जरूरत नहीं
हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी को डर के बजाय अतिरिक्त सावधानी के संकेत के रूप में समझना चाहिए। नियमित प्रेग्नेंसी चेकअप कराना, डॉक्टर की सलाह का पालन करना और निर्धारित दवाओं को बिना चिकित्सकीय सलाह के बंद नहीं करना महत्वपूर्ण है। यदि महिला को पहले से ब्लड प्रेशर या ब्लड शुगर की समस्या है, तो उसे नियंत्रित रखना भी जरूरी होता है।
किन लक्षणों पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें?
गर्भावस्था के दौरान तेज सिरदर्द, धुंधला दिखाई देना, अचानक ज्यादा सूजन, ब्लीडिंग, पेट में तेज दर्द या बच्चे की मूवमेंट कम महसूस होना जैसे असामान्य लक्षण नजर आएं, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय समय पर मेडिकल सलाह लेना जरूरी है। सही समय पर पहचान और नियमित निगरानी से कई संभावित जटिलताओं को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
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