सुप्रीम कोर्ट में SIR (Standardized Identification Requirement) को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह प्रक्रिया वोटरों के खिलाफ नहीं, बल्कि उनके हित में है। कोर्ट ने इस मामले पर बिहार को लेकर की गई कुछ टिप्पणियों पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि “बिहार को बदनाम न करें”, क्योंकि प्रशासनिक सेवाओं में राज्य की हिस्सेदारी सबसे अधिक है।
क्या है मामला?
SIR को लेकर विपक्षी दलों और कुछ याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें यह तर्क दिया गया कि SIR के तहत जिन 11 दस्तावेजों को जरूरी बनाया गया है, वे देश के बड़े हिस्से, खासकर बिहार जैसे राज्यों के ग्रामीण और वंचित तबकों के लिए अव्यवहारिक हैं।
वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में दलील दी कि SIR से वोटर पहचान में जटिलता आएगी। उन्होंने कहा, “बिहार में 1-2 प्रतिशत लोगों के पास ही पासपोर्ट है। निवास प्रमाणपत्र और प्रॉपर्टी दस्तावेज गरीबों के पास नहीं होते। ज़मीन न होने पर प्रॉपर्टी दस्तावेज कैसे होंगे?” उन्होंने इस पर भी सवाल उठाया कि वोटर ID और आधार कार्ड को SIR में शामिल नहीं किया गया, जबकि यही सबसे व्यापक रूप से उपलब्ध पहचान पत्र हैं।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि “हमें आपका आधार को लेकर तर्क समझ में आता है, लेकिन बाकी दस्तावेजों की बहुलता वोटरों के हित में है, उनके खिलाफ नहीं।” उन्होंने कहा कि नागरिकता साबित करने के लिए कई विकल्प दिए गए हैं, जिससे लोगों को सुविधा होगी, बाधा नहीं।
जस्टिस सूर्यकांत ने भी सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि “बिहार को इस तरह पेश करना ठीक नहीं है। IAS, IRS और IPS में सबसे ज़्यादा प्रतिनिधित्व बिहार का ही है। ये तभी संभव है जब वहां की युवा पीढ़ी शिक्षा के प्रति गंभीर हो।”
सिंघवी का जवाब
सिंघवी ने अपनी दलील में स्पष्ट किया कि उनका इरादा बिहार को नीचा दिखाना नहीं है। उन्होंने कहा कि “बिहार में प्रतिभाशाली लोग हैं, वैज्ञानिक हैं, लेकिन बाढ़ प्रभावित और गरीब क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए 11 दस्तावेजों की सूची अव्यावहारिक है। SIR पर आपत्ति नहीं है, लेकिन चुनाव से ठीक पहले इसे लागू करना संदेहास्पद है।”उन्होंने चुनाव आयोग पर यह आरोप भी लगाया कि वह SIR के माध्यम से चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करना चाहता है। उन्होंने मांग की कि इस प्रक्रिया को चुनाव के बाद लागू किया जाए, ताकि पर्याप्त समय मिले और सभी नागरिक तैयारी कर सकें।
SIR को लेकर कानूनी और राजनीतिक बहस जारी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि यह प्रक्रिया वोटर के अधिकारों को सीमित करने के लिए नहीं, बल्कि पहचान की पारदर्शिता और सुरक्षा के लिए है। अब देखना होगा कि आने वाले दिनों में अदालत क्या अंतिम फैसला सुनाती है।
SIR पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “ये वोटरों के खिलाफ नहीं, बल्कि वोटर-फ्रेंडली है”
सुप्रीम कोर्ट में SIR (Standardized Identification Requirement) को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह प्रक्रिया वोटरों के खिलाफ नहीं, बल्कि उनके हित में है। कोर्ट ने इस मामले पर बिहार को लेकर की गई कुछ टिप्पणियों पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि “बिहार को बदनाम न करें”, क्योंकि प्रशासनिक सेवाओं में राज्य की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। क्या है मामला? SIR को लेकर विपक्षी दलों और कुछ याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें यह तर्क दिया गया कि SIR के तहत जिन 11 दस्तावेजों को जरूरी बनाया गया है, वे देश के बड़े हिस्से, खासकर बिहार जैसे राज्यों के ग्रामीण और वंचित तबकों के लिए अव्यवहारिक हैं। वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में दलील दी कि SIR से वोटर पहचान में जटिलता आएगी। उन्होंने कहा, “बिहार में 1-2 प्रतिशत लोगों के पास ही पासपोर्ट है। निवास प्रमाणपत्र और प्रॉपर्टी दस्तावेज गरीबों के पास नहीं होते। ज़मीन न होने पर प्रॉपर्टी दस्तावेज कैसे होंगे?” उन्होंने इस पर भी सवाल उठाया कि वोटर ID और आधार कार्ड को SIR में शामिल नहीं किया गया, जबकि यही सबसे व्यापक रूप से उपलब्ध पहचान पत्र हैं। सुप्रीम कोर्ट का रुख इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि “हमें आपका आधार को लेकर तर्क समझ में आता है, लेकिन बाकी दस्तावेजों की बहुलता वोटरों के हित में है, उनके खिलाफ नहीं।” उन्होंने कहा कि नागरिकता साबित करने के लिए कई विकल्प दिए गए हैं, जिससे लोगों को सुविधा होगी, बाधा नहीं। जस्टिस सूर्यकांत ने भी सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि “बिहार को इस तरह पेश करना ठीक नहीं है। IAS, IRS और IPS में सबसे ज़्यादा प्रतिनिधित्व बिहार का ही है। ये तभी संभव है जब वहां की युवा पीढ़ी शिक्षा के प्रति गंभीर हो।” सिंघवी का जवाब सिंघवी ने अपनी दलील में स्पष्ट किया कि उनका इरादा बिहार को नीचा दिखाना नहीं है। उन्होंने कहा कि “बिहार में प्रतिभाशाली लोग हैं, वैज्ञानिक हैं, लेकिन बाढ़ प्रभावित और गरीब क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए 11 दस्तावेजों की सूची अव्यावहारिक है। SIR पर आपत्ति नहीं है, लेकिन चुनाव से ठीक पहले इसे लागू करना संदेहास्पद है।”उन्होंने चुनाव आयोग पर यह आरोप भी लगाया कि वह SIR के माध्यम से चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करना चाहता है। उन्होंने मांग की कि इस प्रक्रिया को चुनाव के बाद लागू किया जाए, ताकि पर्याप्त समय मिले और सभी नागरिक तैयारी कर सकें। SIR को लेकर कानूनी और राजनीतिक बहस जारी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि यह प्रक्रिया वोटर के अधिकारों को सीमित करने के लिए नहीं, बल्कि पहचान की पारदर्शिता और सुरक्षा के लिए है। अब देखना होगा कि आने वाले दिनों में अदालत क्या अंतिम फैसला सुनाती है।
सुप्रीम कोर्ट में SIR (Standardized Identification Requirement) को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह प्रक्रिया वोटरों के खिलाफ नहीं, बल्कि उनके हित में है। कोर्ट ने इस मामले पर बिहार को लेकर की गई कुछ टिप्पणियों पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि “बिहार को बदनाम न करें”, क्योंकि प्रशासनिक सेवाओं में राज्य की हिस्सेदारी सबसे अधिक है।
क्या है मामला?
SIR को लेकर विपक्षी दलों और कुछ याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें यह तर्क दिया गया कि SIR के तहत जिन 11 दस्तावेजों को जरूरी बनाया गया है, वे देश के बड़े हिस्से, खासकर बिहार जैसे राज्यों के ग्रामीण और वंचित तबकों के लिए अव्यवहारिक हैं।
वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में दलील दी कि SIR से वोटर पहचान में जटिलता आएगी। उन्होंने कहा, “बिहार में 1-2 प्रतिशत लोगों के पास ही पासपोर्ट है। निवास प्रमाणपत्र और प्रॉपर्टी दस्तावेज गरीबों के पास नहीं होते। ज़मीन न होने पर प्रॉपर्टी दस्तावेज कैसे होंगे?” उन्होंने इस पर भी सवाल उठाया कि वोटर ID और आधार कार्ड को SIR में शामिल नहीं किया गया, जबकि यही सबसे व्यापक रूप से उपलब्ध पहचान पत्र हैं।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि “हमें आपका आधार को लेकर तर्क समझ में आता है, लेकिन बाकी दस्तावेजों की बहुलता वोटरों के हित में है, उनके खिलाफ नहीं।” उन्होंने कहा कि नागरिकता साबित करने के लिए कई विकल्प दिए गए हैं, जिससे लोगों को सुविधा होगी, बाधा नहीं।
जस्टिस सूर्यकांत ने भी सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि “बिहार को इस तरह पेश करना ठीक नहीं है। IAS, IRS और IPS में सबसे ज़्यादा प्रतिनिधित्व बिहार का ही है। ये तभी संभव है जब वहां की युवा पीढ़ी शिक्षा के प्रति गंभीर हो।”
सिंघवी का जवाब
सिंघवी ने अपनी दलील में स्पष्ट किया कि उनका इरादा बिहार को नीचा दिखाना नहीं है। उन्होंने कहा कि “बिहार में प्रतिभाशाली लोग हैं, वैज्ञानिक हैं, लेकिन बाढ़ प्रभावित और गरीब क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए 11 दस्तावेजों की सूची अव्यावहारिक है। SIR पर आपत्ति नहीं है, लेकिन चुनाव से ठीक पहले इसे लागू करना संदेहास्पद है।”उन्होंने चुनाव आयोग पर यह आरोप भी लगाया कि वह SIR के माध्यम से चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करना चाहता है। उन्होंने मांग की कि इस प्रक्रिया को चुनाव के बाद लागू किया जाए, ताकि पर्याप्त समय मिले और सभी नागरिक तैयारी कर सकें।
SIR को लेकर कानूनी और राजनीतिक बहस जारी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि यह प्रक्रिया वोटर के अधिकारों को सीमित करने के लिए नहीं, बल्कि पहचान की पारदर्शिता और सुरक्षा के लिए है। अब देखना होगा कि आने वाले दिनों में अदालत क्या अंतिम फैसला सुनाती है।
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