Election freebies India: बिहार समेत देश के कई राज्यों में चुनावों से पहले मतदाताओं को लुभाने के लिए भारी-भरकम लोकलुभावन वादे किए जा रहे हैं। लेकिन इन वादों की कीमत राज्य सरकारों की वित्तीय सेहत चुका रही है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल और RBI दोनों ही चेतावनी दे चुके हैं कि इस तरह का खर्च वित्तीय असंतुलन को जन्म दे रहा है, जिससे विकास के बुनियादी क्षेत्रों—जैसे सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा—की उपेक्षा हो रही है।

बिहार: 62% कमाई चुनावी वादों पर खर्च
बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले ₹33,920 करोड़ के नए वादे किए गए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन वादों को पूरा करने में राज्य की खुद की कमाई का 62.46% खर्च हो जाएगा। यदि ये वादे सत्ता में आने वाली सरकार द्वारा पूरी तरह लागू किए जाते हैं, तो कुल सरकारी खर्च ₹1.26 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है, जो कि राज्य की कुल कमाई से 133.32% ज्यादा है।

बिहार की 2024-25 में टैक्स से अनुमानित कमाई मात्र ₹54,300 करोड़ रही है। लेकिन वेतन, पेंशन और कर्ज के ब्याज जैसे अनिवार्य खर्चों में ही यह कमाई 171% तक खर्च हो जाती है। बाकी जरूरतों के लिए राज्य केंद्र सरकार से विशेष सहायता या बाजार से कर्ज लेने पर निर्भर है।
तेलंगाना और कर्नाटक का भी बुरा हाल
तेलंगाना सरकार अपनी कमाई का 57% चुनावी वादों पर खर्च कर रही है, जबकि 80% बजट वेतन और भत्तों पर जा रहा है। “लाड़ली बहन योजना” जैसी स्कीम अकेले 22% कमाई खा जाती है। यही हाल कर्नाटक का है, जहां 6 गारंटी योजनाओं को लागू करने में कमाई का 35% हिस्सा जा रहा है। शेष बजट का बड़ा भाग वेतन और ब्याज भुगतान में खर्च हो रहा है, जिससे सड़क मरम्मत तक के लिए बजट नहीं बच पा रहा।
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी उधारी बढ़ी
2024-25 में जिन बड़े राज्यों में उधारी सबसे ज्यादा बढ़ी है, उनमें मध्य प्रदेश शीर्ष पर है। यहां की सरकार अपनी कमाई का 42% वेतन-भत्तों और ब्याज भुगतान में खर्च करती है, जबकि 27% राशि मुफ्त की योजनाओं पर चली जाती है। छत्तीसगढ़ में वादों को पूरा करने में 18% कमाई खर्च हो रही है, जबकि स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र पर खर्च में गिरावट आई है।
RBI और क्रिसिल की चेतावनी
देश की प्रमुख क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के अनुसार, राज्यों में सोशल वेलफेयर खर्च बढ़ रहा है, जिससे वे अब बाजार से कर्ज लेकर इन योजनाओं को लागू कर रहे हैं। इससे वित्तीय असंतुलन बढ़ रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी चेताया है कि अनावश्यक लोकलुभावन वादे और फिजूलखर्ची से भविष्य में आर्थिक संकट गहरा सकता है।
राज्य सरकारों का ध्यान अगर सिर्फ चुनावी फायदे और तात्कालिक लोकप्रियता पर रहेगा, तो बुनियादी ढांचे और विकास की बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। बिहार जैसे राज्य, जो पहले से ही वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, वहां लोकलुभावन योजनाओं के चलते विकास की गाड़ी रुकने का खतरा और बढ़ गया है।
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