Mahabharata: महाभारत में धृतराष्ट्र की चार बड़ी गलतियां, जिन्होंने कुरुक्षेत्र युद्ध की नींव रखी थी

Mahabharata:  महाभारत भारतीय इतिहास का वह गौरवशाली महाग्रंथ है, जिसमें मानवीय प्रवृत्तियों का सूक्ष्म चित्रण मिलता है। इस ग्रंथ के सबसे जटिल पात्रों में यदि किसी का नाम शीर्ष पर आता है, तो वह है हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र। धृतराष्ट्र का व्यक्तित्व न केवल उनकी शारीरिक दिव्यांगता के कारण, बल्कि उनकी वैचारिक और मानसिक रुग्णता के कारण भी हमेशा चर्चा में रहा है। वे कुरु साम्राज्य के सर्वोच्च शासक थे, और महाभारत के भीषण युद्ध को रोकने का नैतिक अधिकार व शक्ति केवल उन्हीं के पास थी। दुर्भाग्यवश, वे सत्ता और पुत्र के प्रति अपने मोह में इतने अंधे हो गए थे कि उन्होंने अपने ही वंश का सर्वनाश होते देख लिया। उन्हें सिर्फ आंखों से ही नहीं, बल्कि सत्य की परख के मामले में भी अंधा कहना कदापि गलत नहीं होगा।

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गांधारी का परिवार और शकुनि के प्रति क्रूरता

धृतराष्ट्र के चरित्र की क्रूरता का पहला प्रमाण उनके विवाह के समय मिलता है। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि गांधारी का पहला विवाह एक बकरे के साथ हुआ था, तो इस ‘छल’ से क्षुब्ध होकर उन्होंने गांधारी के पूरे परिवार को बंदी बना लिया। कारागार में उन्हें भोजन की भारी कमी से जूझना पड़ा, जिसके चलते धीरे-धीरे गांधारी के परिवार के सभी सदस्य काल के गाल में समा गए। अंत में केवल शकुनि जीवित बचा, जिसके मन में प्रतिशोध की ज्वाला जल उठी। शकुनि ने हस्तिनापुर को बर्बाद करने की जो शपथ ली, उसका बीज धृतराष्ट्र की उसी क्रूरता ने बोया था। उन्होंने जानते हुए भी शकुनि को दुर्योधन के साथ रहने और पांडवों के विरुद्ध षड्यंत्र रचने से कभी नहीं रोका, जो उनके विनाश का एक बड़ा कारण बना।

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पुत्रमोह का अभिशाप: दुर्योधन के अधर्म को मौन समर्थन

धृतराष्ट्र के जीवन का सबसे बड़ा दुर्गुण उनका अंधा ‘पुत्रमोह’ था। दुर्योधन अधर्म का पर्याय बन चुका था, लेकिन धृतराष्ट्र की ममता ने उनकी न्यायप्रियता को समाप्त कर दिया था। वे जानते थे कि दुर्योधन की नीतियां विनाशकारी हैं, फिर भी उन्होंने हर कदम पर उसका समर्थन किया। अगर महाराज अपनी सत्ता के मोह और पुत्र के प्रति अत्यधिक आसक्ति को किनारे रखकर धर्म का मार्ग चुनते, तो संभवतः कुरुक्षेत्र का वह महायुद्ध कभी नहीं होता। उन्होंने अपनी आंखों के सामने दुर्योधन को निरंकुश होते देखा और मौन रहे। यह मौन उनकी कायरता और दुर्बल इच्छाशक्ति को दर्शाता है, जिसने एक पूरे साम्राज्य को राख के ढेर में बदल दिया।

द्रौपदी का चीरहरण और नैतिक पतन की पराकाष्ठा

द्रौपदी का चीरहरण महाभारत की वह घटना है जिसने युद्ध की आग में घी डालने का काम किया। हस्तिनापुर की भरी सभा में, जहाँ पितामह भीष्म, गुरु द्रोण और विदुर जैसे महान ज्ञानी उपस्थित थे, धृतराष्ट्र का मौन रहना उनके नैतिक पतन की पराकाष्ठा थी। उन्होंने सत्य और धर्म के पक्ष में बोलने के बजाय दुर्योधन के दुस्साहस को मूक स्वीकृति दी। उन्होंने भीष्म, द्रोणाचार्य और विदुर जैसे अनुभवी लोगों की उचित सलाहों को अनसुना कर दिया, क्योंकि वे सत्य को सुनने की इच्छा ही नहीं रखते थे। धृतराष्ट्र का यह निर्णय न केवल एक राजा के रूप में उनकी विफलता थी, बल्कि एक पिता और अभिभावक के रूप में भी उनके पतन का प्रमाण था। उनकी यह सत्ता-लिप्सा और अधर्म के प्रति यह समर्पण इतिहास में सदैव एक चेतावनी के रूप में याद किया जाएगा।

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Chandan Das

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