Cauvery Water Dispute: तमिलनाडु सरकार ने कावेरी नदी से अपने हिस्से का पानी छोड़े जाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। 17 अगस्त को इस मामले पर सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित आंकड़ों के साथ स्टेटस रिपोर्ट मांगी। विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब कावेरी जल विनियमन समिति ने कर्नाटक को 29 जुलाई से लगातार 15 दिनों तक प्रतिदिन 3500 क्यूसेक पानी तमिलनाडु के लिए छोड़ने को कहा था। निर्देश का पालन नहीं होने के बाद तमिलनाडु ने अदालत से हस्तक्षेप की मांग की।
भारत के पुराने अंतरराज्यीय जल विवादों में शामिल है कावेरी
कावेरी जल विवाद देश के सबसे पुराने अंतरराज्यीय नदी जल विवादों में गिना जाता है। इसका मुख्य टकराव कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच है, जबकि केरल और पुडुचेरी भी कावेरी नदी बेसिन के हिस्सेदार हैं। विवाद का मूल सवाल नदी के पानी में प्रत्येक राज्य का हिस्सा और कम बारिश के समय उपलब्ध पानी के बंटवारे से जुड़ा है।
कावेरी नदी का पानी दोनों राज्यों के लिए महत्वपूर्ण
कावेरी का उद्गम कर्नाटक के कोडगु जिले के पश्चिमी घाट से होता है। नदी कर्नाटक से बहकर तमिलनाडु पहुंचती है और अंत में बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा में खेती, विशेषकर धान उत्पादन, नदी के पानी पर काफी निर्भर है। वहीं कर्नाटक को सिंचाई के अलावा बेंगलुरु के पेयजल और जलाशय परियोजनाओं के लिए पानी की जरूरत होती है। इसलिए यह विवाद खेती के साथ पेयजल, मानसून, पर्यावरण और क्षेत्रीय राजनीति से भी जुड़ा है।
1892 और 1924 के समझौतों से शुरू हुआ विवाद
कावेरी जल बंटवारे को लेकर शुरुआती बड़े समझौते ब्रिटिश शासन के दौरान हुए थे। 1892 के समझौते में मैसूर रियासत को कावेरी की सहायक नदियों पर नई सिंचाई परियोजनाएं शुरू करने से पहले मद्रास प्रशासन से परामर्श करना होता था। इसके बाद 1924 में एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ, जिसकी अवधि 50 वर्ष तय की गई थी। इसके तहत मैसूर में कृष्णराज सागर और मद्रास क्षेत्र में मेट्टूर बांध जैसी परियोजनाओं को अनुमति मिली। 1974 के बाद विवाद फिर तेज होने लगा।
दोनों राज्यों की जरूरतें अलग-अलग
कर्नाटक कावेरी के ऊपरी हिस्से में स्थित है, इसलिए उसके पास जलाशयों में पानी संग्रह करने की क्षमता है। तमिलनाडु निचले हिस्से में होने के कारण समय पर पानी मिलने पर निर्भर रहता है। अच्छे मानसून में विवाद कम रहता है, लेकिन कम बारिश के वर्षों में दोनों राज्यों के हित टकराने लगते हैं। तमिलनाडु तय समय और मात्रा के अनुसार पानी छोड़ने की मांग करता है, जबकि कर्नाटक जलाशयों, किसानों और शहरों की मौजूदा स्थिति को ध्यान में रखने की बात करता है।
तमिलनाडु की प्रमुख दलीलें
तमिलनाडु का कहना है कि उसके कावेरी डेल्टा के लाखों किसानों की आजीविका नदी पर निर्भर है। फसलों के लिए सही समय पर पानी मिलना बेहद जरूरी है। राज्य का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट और कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण द्वारा तय व्यवस्था का पालन होना चाहिए। तमिलनाडु मेकेदातु परियोजना को लेकर भी चिंतित है और उसका मानना है कि इससे निचले हिस्से में पानी का प्रवाह प्रभावित हो सकता है।
कर्नाटक क्यों करता है पानी रोकने की मांग?
कर्नाटक का तर्क है कि पुराने समझौते ऐसे समय में बने थे, जब उसकी सिंचाई और शहरी जरूरतें आज की तुलना में काफी कम थीं। अब आबादी बढ़ने के साथ बेंगलुरु की पेयजल आवश्यकता भी बढ़ी है। राज्य के किसान भी कावेरी पर निर्भर हैं। कर्नाटक का कहना है कि कम बारिश और जलाशयों में कम भंडारण के दौरान तय मात्रा में पानी छोड़ना मुश्किल हो सकता है। उसके अनुसार वास्तविक बारिश, नदी प्रवाह और जलाशय स्तर देखकर फैसला होना चाहिए।
2018 के सुप्रीम कोर्ट फैसले में तय हुआ हिस्सा
केंद्र ने 1990 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया था। न्यायाधिकरण ने 2007 में अपना फैसला दिया। इसके बाद 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इसमें कुछ बदलाव किए। संशोधित व्यवस्था में कर्नाटक के हिस्से को 284.75 टीएमसी, तमिलनाडु को 404.25 टीएमसी, केरल को 30 टीएमसी और पुडुचेरी को 7 टीएमसी पानी का प्रावधान किया गया। हालांकि तमिलनाडु का पूरा हिस्सा कर्नाटक से आने वाला पानी नहीं है; इसमें स्थानीय वर्षा और जल स्रोत भी शामिल हैं।
कावेरी प्रबंधन संस्थाएं करती हैं निगरानी
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण और कावेरी जल विनियमन समिति का गठन किया गया। ये संस्थाएं वर्षा, नदी प्रवाह, जलाशयों के भंडारण और राज्यों की जरूरतों की समीक्षा करती हैं। जरूरत पड़ने पर समिति कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने के निर्देश देती है। कम बारिश के वर्षों में इन्हीं निर्देशों को लेकर दोनों राज्यों के बीच तनाव बढ़ जाता है।
मेकेदातु परियोजना भी विवाद का बड़ा कारण
कर्नाटक की प्रस्तावित मेकेदातु परियोजना भी कावेरी विवाद का अहम मुद्दा है। कर्नाटक इसे बेंगलुरु की पेयजल और बिजली जरूरतों से जोड़ता है। वहीं तमिलनाडु को आशंका है कि परियोजना से नीचे की ओर जाने वाला पानी प्रभावित हो सकता है। कर्नाटक इसे जल संग्रह और शहरी जरूरतों की परियोजना बताता है। यही मतभेद कावेरी विवाद को लगातार कानूनी और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनाए हुए है।
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