SC Teachers Order : सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षकों की नियुक्ति और उनकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर अहम अंतरिम आदेश जारी किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि निर्धारित वैधानिक योग्यता पूरी किए बिना किसी शिक्षक या ट्यूटर को स्कूल अथवा कॉलेज में नियुक्त नहीं किया जा सकता। ऐसे शिक्षकों को बाद में सरकारी सेवा में समायोजित करने की अनुमति भी नहीं होगी। अदालत ने शिक्षा व्यवस्था में योग्य शिक्षकों की नियुक्ति को अनिवार्य बताते हुए गुणवत्ता से समझौता नहीं करने की बात कही है।
RTE, NCTE और UGC के नियमों का पालन जरूरी
चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने कहा कि शिक्षकों की नियुक्ति के दौरान RTE Act, NCTE Act और UGC Act के तहत निर्धारित योग्यता और नियमों का पालन किया जाना चाहिए। कोर्ट के मुताबिक शिक्षक की नियुक्ति केवल किसी संस्थान की जरूरत के आधार पर नहीं हो सकती, बल्कि उम्मीदवार का निर्धारित मानकों को पूरा करना जरूरी है।
बच्चों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मौलिक अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा की गुणवत्ता को संविधान के अनुच्छेद 21A से जोड़ते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि बच्चों को अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करने का अधिकार मौलिक अधिकार के दायरे में आता है। इसलिए शिक्षकों की नियुक्ति में ऐसे किसी भी तरीके को स्वीकार नहीं किया जा सकता, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका हो।
असम सरकार की योजना बनी विवाद का कारण
यह मामला असम सरकार की एक ऐसी योजना से जुड़ा है, जिसमें निर्धारित योग्यता पूरी नहीं करने वाले शिक्षकों और कर्मचारियों को सरकारी सेवा में शामिल करने का प्रावधान बताया गया है। इसी व्यवस्था को लेकर राजेश चौहान ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। याचिका में इस योजना की वैधता पर सवाल उठाते हुए इसे संविधान के प्रावधानों के खिलाफ बताया गया है।
निजी संस्थानों के कर्मचारियों के समायोजन पर सवाल
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि निजी शैक्षणिक संस्थानों में काम करने वाले शिक्षकों और कर्मचारियों को बिना निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी भर्ती प्रक्रिया के सीधे सरकारी सेवा में शामिल करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन हो सकता है। याचिका में सरकारी नियुक्तियों में समान अवसर और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया गया।
CJI सूर्य कांत ने उठाया कड़ा सवाल
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने बिना निर्धारित योग्यता वाले लोगों की शिक्षक के तौर पर नियुक्ति को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि आखिर बिना जरूरी योग्यता के लोगों को शिक्षक क्यों नियुक्त किया जा रहा है। अदालत की यह टिप्पणी शिक्षकों की नियुक्ति में निर्धारित मानकों का पालन करने को लेकर उसकी गंभीरता को दर्शाती है।
ट्यूटर कहकर नियमों से बचने की कोशिश का आरोप
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील रंजीत कुमार ने अदालत को बताया कि जिन लोगों की नियुक्ति पर सवाल उठ रहे हैं, उन्हें ‘ट्यूटर’ बताकर मामले की वास्तविक प्रकृति बदलने की कोशिश की जा रही है। इस पर चीफ जस्टिस ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी व्यवस्था का असर आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर पड़ सकता है। अदालत ने शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता और योग्यता को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही।
असम सरकार और शिक्षा विभाग को निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार और उसके शिक्षा विभाग को निर्देश दिया कि RTE, NCTE और UGC के तहत निर्धारित वैधानिक योग्यता पूरी नहीं करने वाले किसी शिक्षक या ट्यूटर की नियुक्ति नहीं की जाए। साथ ही ऐसे लोगों को सरकारी सेवा में समायोजित करने से भी रोक दिया गया है। आदेश का उद्देश्य शिक्षण व्यवस्था में न्यूनतम निर्धारित योग्यता सुनिश्चित करना है।
दूसरे राज्यों पर भी पड़ सकता है असर
सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा अंतरिम आदेश असम से जुड़े मामले में आया है, लेकिन इसके व्यापक प्रभाव की संभावना जताई जा रही है। खासकर उन राज्यों में जहां इसी तरह की व्यवस्था के तहत गैर-मानक या अयोग्य शिक्षकों को सरकारी सेवा में समायोजित करने की प्रक्रिया चल रही है, वहां इस आदेश को महत्वपूर्ण माना जा सकता है। अब संबंधित सरकारों की नीतियों और नियुक्ति प्रक्रियाओं पर भी अदालत के इस रुख का असर पड़ने की संभावना है।
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