Women Reservation Bill
Women Reservation Bill : राजनीतिक गलियारों में अक्सर यह चर्चा रहती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक देश में एक विशाल ‘बेनिफिशियरी’ (लाभार्थी) वर्ग का निर्माण करना है। इस वर्ग में सबसे बड़ी संख्या महिलाओं की है, जिन्होंने पिछले कई चुनावों में भाजपा के पक्ष में जमकर मतदान किया है। उज्ज्वला योजना से लेकर मुफ्त राशन तक, केंद्र की योजनाओं ने महिलाओं के बीच एक मजबूत आधार बनाया है। हालांकि, हाल ही में एक मीडिया रिपोर्ट ने दावा किया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) भाजपा के इस रणनीतिक गढ़ को लेकर चिंतित है। संघ की नाराजगी का मुख्य कारण बंगाल और तमिलनाडु जैसे महत्वपूर्ण राज्यों के चुनावों से ठीक पहले ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (महिला आरक्षण विधेयक) का संसद में पारित न हो पाना है।
पिछले कई वर्षों से आरएसएस जमीनी स्तर पर भाजपा के लिए एक समर्पित महिला वोट बैंक तैयार करने पर काम कर रहा है। संघ के शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि संसद में सरकार की हार केवल एक विधायी विफलता नहीं है, बल्कि एक बड़ी राजनीतिक चूक है। रिपोर्ट के अनुसार, संघ इस बात से हैरान है कि जिस बिल को गेम-चेंजर माना जा रहा था, उसे मोदी-शाह की जोड़ी पारित कराने के लिए आवश्यक समर्थन क्यों नहीं जुटा पाई। संघ के नेताओं को लगता है कि इतने संवेदनशील और दूरगामी परिणाम वाले बिल को लेकर जो तैयारी होनी चाहिए थी, वह नदारद थी। संसद में मिली इस हार को संघ एक नकारात्मक संदेश के रूप में देख रहा है।
संघ के सूत्रों के हवाले से यह भी कहा जा रहा है कि शीर्ष नेतृत्व को लगता है कि गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी विपक्ष का भरोसा जीतने और उन्हें इस बिल के पक्ष में लाने के लिए जरूरी कदम नहीं उठा पाए। बिल को पारित कराने के लिए विपक्षी दलों के साथ बेहतर संवाद और समन्वय की आवश्यकता थी, जिसकी कमी स्पष्ट रूप से दिखाई दी। संघ का यह भी तर्क है कि यदि सरकार के पास पर्याप्त संख्या बल सुनिश्चित नहीं था, तो चुनावों से ठीक पहले इसे ‘जबरदस्ती’ पास कराने की कोशिश क्यों की गई? बिना ठोस प्लानिंग के उठाए गए इस कदम ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया है।
गौरतलब है कि मोदी सरकार ने विधानसभा चुनावों से ऐन पहले एक विशेष सत्र बुलाया था, जिसमें तीन महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने की योजना थी। इनमें सबसे प्रमुख ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ था, जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान करता है। मतदान के दौरान इस ऐतिहासिक बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि विरोध में 230 वोट दर्ज किए गए। हालांकि पक्ष में अधिक वोट थे, लेकिन संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत (Special Majority) न मिल पाने के कारण यह बिल गिर गया।
संघ को सबसे बड़ा डर इस बात का है कि संसद की इस हार का सीधा असर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के मौजूदा चुनावों पर पड़ सकता है। ये दोनों राज्य भाजपा के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। विपक्ष अब इस विफलता को भाजपा की ‘कमजोरी’ और महिलाओं के प्रति ‘दिखावे की राजनीति’ के तौर पर प्रचारित कर रहा है। आरएसएस का मानना है कि जो बिल मास्टरस्ट्रोक साबित होना था, वह अब विपक्ष के हाथ में एक हथियार बन गया है। अब देखना यह होगा कि भाजपा इस विफलता से उपजे असंतोष को कैसे संभालती है और मतदान के अंतिम चरणों में महिलाओं का भरोसा कैसे वापस जीतती है।
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