Sambhal Jama Masjid : संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ के सामने मस्जिद कमेटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने अपनी दलीलें रखीं। उन्होंने कहा कि किसी धार्मिक स्थल, विशेष रूप से संरक्षित प्राचीन स्मारक, की धार्मिक पहचान को बदला नहीं जा सकता। मुस्लिम पक्ष ने निचली अदालत द्वारा सर्वे के लिए कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किए जाने के फैसले की वैधता पर भी सवाल उठाया।
निचली अदालत के आदेश से शुरू हुआ विवाद
यह मामला उत्तर प्रदेश के संभल स्थित शाही जामा मस्जिद से जुड़ा है। निचली अदालत ने नवंबर 2024 में मस्जिद का सर्वे कराने का आदेश दिया था। मस्जिद कमेटी ने इस फैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन राहत नहीं मिलने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। शीर्ष अदालत ने दिसंबर में सर्वे के आदेश पर रोक लगा दी थी। मंगलवार को मुस्लिम पक्ष की दलीलें पूरी हो गईं और अब अगली सुनवाई में हिंदू पक्ष अपनी बात रखेगा।
धार्मिक पहचान बदलने की अनुमति नहीं: मुस्लिम पक्ष
हुजेफा अहमदी ने पूजा स्थल कानून, 1991 और प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्व स्थल तथा अवशेष कानून, 1958 का हवाला देते हुए कहा कि धार्मिक स्थल का चरित्र बदला नहीं जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दोनों कानूनों की सही व्याख्या नहीं की। उनका तर्क था कि यदि कोई संरक्षित स्मारक मंदिर है तो उसे चर्च में नहीं बदला जा सकता और यदि वह मस्जिद है तो उसे मंदिर में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।
स्मारक के साथ धार्मिक स्वरूप की सुरक्षा भी जरूरी
अहमदी ने कहा कि 1958 के कानून के तहत किसी प्राचीन स्मारक का संरक्षण केवल उसकी इमारत तक सीमित नहीं है। यदि किसी स्मारक का धार्मिक स्वरूप है तो उसकी धार्मिक पहचान की रक्षा भी जरूरी है। उन्होंने कानून की अलग-अलग धाराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि संरक्षित धार्मिक स्थल पर ऐसी गतिविधि की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, जिससे उसके मौजूदा धार्मिक चरित्र पर असर पड़े।
मुतवल्ली की भूमिका पर भी रखी गई दलील
मस्जिद से जुड़े समझौतों की हाई कोर्ट द्वारा की गई व्याख्या पर भी मुस्लिम पक्ष ने आपत्ति जताई। अहमदी ने कहा कि मुतवल्ली का काम केवल संपत्ति की देखरेख करना है। मुस्लिम कानून के अनुसार मस्जिद की संपत्ति का अंतिम मालिकाना हक इंसान का नहीं बल्कि अल्लाह का माना जाता है। उन्होंने सर्वे के लिए स्थानीय आयुक्त नियुक्त करने के निचली अदालत के आदेश को भी चुनौती दी।
बिना नोटिस सर्वे कराने पर उठाए सवाल
अहमदी ने दलील दी कि निचली अदालत ने सीपीसी के आदेश 26 नियम 9 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। उनके अनुसार सर्वे, फोटो और वीडियो बनाने की मांग वाली अर्जी मस्जिद कमेटी को पहले नोटिस दिए बिना पेश की गई। उन्होंने कहा कि अदालत ने यह भी पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं किया कि स्थल का निरीक्षण जरूरी क्यों था और कोर्ट कमिश्नर को किन विशेष बिंदुओं की जांच करनी थी।
सर्वे के बाद हुई हिंसा का दिया गया हवाला
मस्जिद कमेटी के वकील ने सर्वे के दौरान हुई हिंसा का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कोर्ट कमिश्नर के मस्जिद परिसर में पहुंचने के बाद हिंसा हुई, जिसमें छह लोगों की मौत हुई। उनका कहना था कि इतने संवेदनशील धार्मिक विवाद में अदालत को प्रक्रिया अपनाते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए थी। उन्होंने 1991 के पूजा स्थल कानून से जुड़े अन्य मामलों के साथ इस मामले को जोड़कर सुनने की मांग भी की।
सुप्रीम कोर्ट ने सहनशीलता पर दिया जोर
सुनवाई के दौरान जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने समाज में सहनशीलता बनाए रखने की जरूरत पर टिप्पणी की। मंगलवार को मुस्लिम पक्ष की दलीलें पूरी होने के बाद अब हिंदू पक्ष की बारी है। अगली सुनवाई में हिंदू पक्ष सर्वे के आदेश और उससे जुड़े कानूनी सवालों पर अपनी दलीलें रखेगा।
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी सवाल
अब शीर्ष अदालत के सामने प्रमुख सवाल यह है कि धार्मिक स्वरूप वाले संरक्षित स्मारक पर पूजा स्थल कानून और प्राचीन स्मारक कानून के प्रावधान किस तरह लागू होंगे। इसके साथ ही यह भी तय होना है कि ऐसे संवेदनशील मामले में स्थानीय आयुक्त से सर्वे कराने के लिए निचली अदालत ने निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया था या नहीं। मामले में आगे की सुनवाई इन महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दों पर केंद्रित रहने की संभावना है।
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